सम्पूर्णता से ही संस्कार व संस्कृति पैदा हुई : कलराज मिश्र

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सम्पूर्णता से ही संस्कार व संस्कृति पैदा हुई : कलराज मिश्र

–भारतीय संविधान के मूल भाव में संस्कृति है : हितेश शंकरमहाकुम्भ नगर, 02 फरवरी (हि.स.)। तीर्थराज प्रयाग के महाकुम्भ में सांस्कृतिक एकता का दर्शन हो रहा है और अनुभूति भी हो रही है। एक राष्ट्रीय अनुशासन का लोगों में आचार-विचार प्रदर्शित हो रहा है। हमारे भारत की विरासत लोगों में बनी रहे, इन्हीं सब के लिए महाकुम्भ में संत-महात्मा कथावाचन कर रहे हैं, समुद्र मंथन कर रहे हैं। सम्पूर्णता से ही संस्कार व संस्कृति पैदा हुई है। यह बातें पूर्व राज्यपाल एवं केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र ने रविवार की सायं राधे श्याम चैरिटेबल फाउंडेशन के बैनरतले इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन कन्वेंशन सेंटर में आयोजित ‘‘संस्कार सम्मेलन’’ में ‘‘संविधान और संस्कृति’’ विषय पर कहा। उन्होंने लोगों को सम्बोधित करते हुए संविधान पर प्रकाश डाला। कहा कि समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिए संविधान बनाये गये। उन्होंने कहा कि संविधान के प्रथम पृष्ठ पर अशोक स्तम्भ एवं कमल का फूल अंकित है। कमल को सभी जानते हैं, जहां मॉ लक्ष्मी, सरस्वती आदि रहती हैं। उन्होंने प्रभु श्री राम एवं कृष्ण का वर्णन किया। कहा कि गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन का उपदेश दिया है। इस गीता का एक-एक श्लोक मायने रखता है। धर्म हमारी विरासत का संदेश देता है। हमारा धर्म कोई पंथ नहीं है, यह संकुचित नहीं है। हमारा संविधान कहता है संतुलन बनाये रखो। हमारे भारत में ही नदियों को मॉ की संज्ञा दी गयी है, सभी पेड़ पौधों को पूजा जाता है। उन्होंने कहा कि जब भगवान श्रीराम लंका विजय के बाद अयोध्या लौट रहे थे। हमें इस बात को समझना होगा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने इस तस्वीर के माध्यम से हमें क्या संदेश दिया है। संविधान में ऐसे ही अनेक चित्र और संकेत हैं, जिनके माध्यम से संविधान निर्माताओं ने इंगित किया है कि हमें भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के साथ लोकतंत्र को आगे बढ़ाना है।

विशिष्ट वक्ता पांचजन्य के सम्पादक हितेश शंकर ने कहा कि सनातन का प्रतिनिधित्व करने वाले सद्गुरू पीठाधीश्वर रीतेश्वर महाराज सहित कई लोग आनलाइन जुड़े हुए हैं। महाकुम्भ के लिए जो उन्होंने किया वह किसी से कम नहीं है। उन्होंने कहा हर देश में कोई न कोई वाद है, प्रतिवाद है, विवाद है। लेकिन हमारे भारत देश में कोई वाद नहीं है। क्योंकि भारतीय संविधान के मूल भाव में संस्कृति है। भारतीय संविधान में भारतीयता के तत्व हैं। उन्होंने कहा कि जहां ‘‘अधिकार और कर्तव्य’’ की बात आती है तो अधिकार की बात करेंगे तो व्यवस्था बिगड़ेगी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में ज्यादा अंतर नहीं है। भारतीय संविधान देश की संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि संविधान में सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों का प्रावधान है। संविधान के ज़रिए, देश के लोगों को उनके सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार मिलता है। हमारा संविधान भारत की सदियों पुरानी संस्कृति, इतिहास और परम्पराओं का आइना है। यह संविधान हमारे सदियों के संघर्ष, अनुभव और उपलब्धियों का प्रतिफल है। पीठाधीश्वर रीतेश्वर महाराज ने आनलाइन सम्बोधत करते हुए कहा कि एक तरफ संविधान दूसरी तरफ संस्कृति, धर्म को खड़ा कर दिया गया है। इसके जरिये आज युवकों को दो वर्गों में बांट दिया गया है। उन्होंने बताया कि देश में गुरूकुल की शिक्षा देने के लिए पूरे देश में कई विद्यालय खोले हैं और युवाओं में भारतीय संस्कार की शिक्षा दी जा रही है। उन्होंने कहा पहला संस्कार गर्भ से होता है और अंतिम संस्कार यानि देहांत से समाप्त होता है। इसलिए जो देह मिली है, संस्कारित होकर जियें। संस्कारों से अनभिज्ञ लोग संविधान का पालन नहीं कर सकते। उन्होंने कहा जैसे बिना फाउंडेशन व नीव के महल नहीं बनाये जा सकते। उसी तरह बिना संस्कार के जीवन नहीं जिया जा सकता।इसी प्रकार महापौर गणेश केसरवानी ने संविधान एवं संस्कृति पर अपने विचार व्यक्त किये। कहा कि इस सम्मेलन का लक्ष्य भारतीय संविधान और संस्कृति में निहित मूल्यों को उजागर करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त भविष्य का मार्ग प्रशस्त करना है। कार्यक्रम के आयोजक श्याम चैरिटेबल फाउंडेशन के अध्यक्ष विजय कृष्ण त्रिपाठी, सौरभ त्रिपाठी, वैभव त्रिपाठी, शशी त्रिपाठी, डॉ अव्यक्त राम मिश्र, डॉ माधवेन्द्र मिश्र, हाईकोर्ट से अशोक मेहता, शीतल गौड़ सहित कई लोग उपस्थित रहे।

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