जन आधार कार्ड में फर्जीवाड़ा, बुजुर्ग महिला की हड़पी पेंशन

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जोधपुर, 04 अप्रैल । शहर में जन आधार कार्ड से जुड़ा एक फर्जीवाड़ा सामने आया है। करीब 69 साल की बुजुर्ग महिला के जन आधार रिकॉर्ड में बिना सहमति बदलाव कर न केवल फर्जी सदस्य जोड़ दिया गया, बल्कि एड्रेस बदलकर पेंशन भी हड़प ली। मामले में ई-मित्र संचालक सहित प्रथम एवं द्वितीय स्तर के वेरिफायर की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं।

महिला चौपासनी हाउसिंग बोर्ड की रहने वाली चंद्रकांता पत्नी जीवनराम चौधरी है। उनके बेटे मनोज चौधरी ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई है। रिपोर्ट में ई-मित्र संचालक, वेरिफायर अधिकारियों और राजबहादुर सिंह पर आपराधिक साजिश रचने और दस्तावेजों में कूटरचना कर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया है। दोषियों को सख्त सजा देने और हड़पी गई पेंशन राशि वापस दिलाने की मांग की गई है।

पीडि़त महिला के बेटे ने रिपोर्ट में बताया कि उनकी मां के जन आधार से बैंक ऑफ बड़ोदा, ज्वाला विहार शाखा में उनका बैंक खाता लिंक था, जिसमें वृद्धावस्था पेंशन जमा होती थी। गत 28 मार्च को आरजीएचएस योजना के लिए जन आधार लिंक करवाने के दौरान ई-मित्र संचालक के माध्यम से जब रिकॉर्ड की जांच की गई, तो हैरत में पड़ गए। जन आधार कार्ड में पता बदलकर ग्राम जैलमपुरा वनवास, तहसील लावां, जिला दौसा दर्ज कर दिया गया था। राजबहादुर सिंह नाम का व्यक्ति खुद को महिला का भाई दर्शाते हुए फर्जी तरीके से सदस्य के रूप में जुड़ गया। आरोप है कि यह बदलाव बिना किसी ओटीपी, वीडियो कॉल या सहमति के किया गया।

महिला के बेटे ने रिपोर्ट में बताया कि आरोपियों ने उनकी मां का मूल बैंक खाता हटाकर इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक का खाता जन आधार से लिंक कर दिया। इसके बाद नवंबर 2025 से मां की वृद्धावस्था पेंशन (हर महीने 1500 रुपये) इसी खाते में ट्रांसफर होने लगी, जिसका लाभ आरोपी उठा रहा है। जन आधार में किसी भी बदलाव के लिए दो स्तर पर सत्यापन अनिवार्य होता है।

प्रथम स्तर ग्राम विकास अधिकारी या नगरीय निकाय अधिकारी वेरिफाई करते हैं और दूसरे स्तर पर बीडीओ या एसडीओ वेरीफाई करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार सात अक्टूबर 2025 को ई-मित्र संचालक की ओर से ऑथेंटिकेशन दिखाया गया, जबकि किसी प्रकार का ओटीपी या कॉल नहीं किया गया।

इसके बाद 8 अक्टूबर 2025 को सुबह 10.06 बजे प्रथम स्तर और 10.15 बजे द्वितीय स्तर द्वारा वेरिफिकेशन दर्शाया गया। उस समय महिला उदयपुर में रह रही थीं और कभी भी दौसा नहीं गई हैं, जिससे सत्यापन प्रक्रिया पूरी तरह संदिग्ध प्रतीत होती है।