जोधपुर, 25 मार्च । राजस्थान में कार्यरत पशु चिकित्सकों को नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (एनपीए) देने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस विनीत कुमार माथुर व जस्टिस चन्द्रशेखर शर्मा की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया है कि सरकार 12 सप्ताह के भीतर इस संबंध में निर्णय ले।
वेटनरी एसोसिएशन, राजस्थान की ओर से दायर इस याचिका में प्रारंभ में वेतनमान और अन्य सुविधाओं में समानता की मांग की गई थी, लेकिन सुनवाई के दौरान मुख्य रूप से एनपीए देने के मुद्दे पर ही जोर दिया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत को बताया कि राज्य के पशु चिकित्सक पशुधन और वन्यजीवों की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और उनकी कार्यप्रणाली अन्य राज्यों के चिकित्सकों के समान है। अधिवक्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि देश के कई राज्यों जैसे दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड सहित कई स्थानों पर पशु चिकित्सकों को एनपीए दिया जा रहा है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा 3 जून 2016 को जारी निर्देशों में भी राज्यों को इस दिशा में कदम उठाने के लिए कहा गया था। सातवें वेतन आयोग ने भी इस भत्ते की सिफारिश की है। राज्य सरकार की ओर से जवाब में कहा गया कि एनपीए देना पूरी तरह नीतिगत निर्णय है, जो राज्य की वित्तीय स्थिति और अन्य प्रशासनिक पहलुओं पर निर्भर करता है। यह भी कहा गया कि सभी राज्यों में यह सुविधा लागू नहीं है, इसलिए इसे अनिवार्य रूप से लागू करना जरूरी नहीं है। हालांकि सरकार ने यह स्वीकार किया कि वह इस विषय पर पुन: विचार करेगी। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने माना कि अन्य राज्यों में लागू व्यवस्था और केंद्र सरकार के निर्देशों को देखते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह 12 सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय ले और यदि एनपीए देने से इनकार किया जाता है तो उसका कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपनी अन्य मांगों को लेकर अलग से अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकता है।