जयपुर, 14 मार्च । राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा है कि रिश्वत केस में विश्वसनीय पुख्ता सबूत हों तो फिर शिकायतकर्ता व गवाह मामले में अपने बयानों से पलटकर पक्षद्रोही हो गए हों तो वह प्रभावहीन ही माना जाएगा। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने जेवीवीएनएल के एक सहायक अभियंता व उसके सहयोगी की रिश्वतखोरी के मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर ने यह आदेश पृथ्वीलाल मीणा व हेमराज की अपील को खारिज करते हुए दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद वॉइस रिकॉर्डिंग में शिकायतकर्ताओं और आरोपित के बीच रिश्वत की मांग और राशि तय करने से जुड़ी बातचीत दर्ज थी। ऐसे में अभियोजन ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, ट्रैप कार्यवाही और बरामदगी के जरिए रिश्वत की मांग व मंजूरी को साबित किया है। वहीं हाईकोर्ट ने माना कि सह-आरोपित ने सहायक अभियंता के निर्देश पर रिश्वत की राशि स्वीकार की थी और वह केवल एक मिडिलमैन के रूप में कार्य कर रहा था। ऐसे में मध्यस्थ के जरिए रिश्वत लेना भी अपराध है।
अपील में अभियुक्तों ने कहा कि ट्रायल के दौरान शिकायतकर्ता अपने पूर्व बयानों से मुकर गए और उन्होंने अभियोजन का समर्थन नहीं किया है। जिस पर हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ शिकायतकर्ताओं के अपने बयानों से मुकरने से अभियोजन का पूरा मामला खुद ही खत्म नहीं हो जाता। भ्रष्टाचार के मामलों में कई बार दबाव, समझौते या अन्य कारणों से गवाह बयान बदल लेते हैं। ऐसे में अदालत को उपलब्ध सभी साक्ष्यों का मूल्यांकन भी करना होता है। इस मामले में शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बिजली मीटर निरीक्षण के बाद लगाए गए जुर्माने को कम करने के लिए उनसे आरोपितों ने रिश्वत मांगी थी। जिस पर आरोपितों के खिलाफ ट्रैप के दौरान शिकायतकर्ता ने फिनॉलफ्थेलीन पाउडर लगे 5,500 रुपए की राशि आरोपित के सहयोगी को दी। इसके तुरंत बाद एसीबी टीम ने मौके पर पहुंचकर उसके पास से वही राशि बरामद कर ली। परीक्षण के दौरान फिनॉलफ्थेलीन टेस्ट भी सकारात्मक पाया गया, जिससे यह साबित हुआ कि आरोपित ने रिश्वत की राशि को हाथ लगाया था।