परछाईयांः साहिर लुधियानवी की सृजन स्थली

Share

रास्ते में कई लोगों से पूछते हैं। कोई कंधे उचकाकर कहता है—“पता नहीं।” कोई मुस्कराकर आगे बढ़ जाता है। लेकिन जिद है उस घर को देखने की, जहां साहिर ने अनेक कालजयी गीत और ग़ज़लें लिखीं। दीवारों को छूने की, उन कमरों की हवा में सांस लेने की। चलते रहते हैं, गलियों से गुजरते हैं। और अजीब संयोग—जैसे ही पूछना छोड़ देते हैं, रास्ता खुद खुल जाता है। अचानक एक बड़े, सलेटी रंग के शांत बंगले की नेमप्लेट पर नज़र ठहर जाती है। काले अक्षरों में रोमन लिपि में लिखा है—“Parchhaiyan”।

“परछाईयां”- अर्थात साये। यह नाम पढ़ते ही साहिर की कई पंक्तियाँ ज़ेहन में उभर आती हैं। उनकी शायरी में गहरी उदासी थी, पर वह उदासी निराशा नहीं, बल्कि संवेदना की रोशनी थी। यह बंगला लगभग पांच सौ वर्ग गज में फैला है। मुंबई में रहने वाले वास्तु विशेषज्ञ डॉ जे.पी. शर्मा. लालधागेवाले साहिर साहब के बंगले को गुजरे कई दशकों को देख रहे हैं। वे बताते हैं कि “ इसकी बालकनियों से कभी अरब सागर साफ दिखता होगा। ऊपर की मंज़िलों में साहिर अपनी मां के साथ रहते थे। शाम ढलती, समुद्र से ठंडी हवा आती और कमरों में किताबों, काग़ज़ों और स्याही की हल्की गंध फैल जाती। यही वह जगह थी जहां रातें जागती थीं और शब्द धीरे-धीरे कविता का रूप ले लेते थे।”

सृजन का माहौल और अमर गीत

इस घर के दरवाज़े दोस्तों के लिए हमेशा खुले रहते थे। फिल्मकार, संगीतकार, कवि और शायर यहां आया करते। कोई धुन गुनगुनाता, कोई राजनीति पर बहस छेड़ देता, तो कोई नई कविता सुनाता। साहिर चुपचाप सुनते, फिर अचानक एक पंक्ति कहते—और कमरे में सन्नाटा छा जाता, क्योंकि वह पंक्ति सीधे दिल में उतरती थी। इसी माहौल में कई अमर फिल्मी गीत जन्मे। जैसे “उड़ें जब-जब ज़ुल्फें तेरी” (फिल्म: नौटंकी), जो प्रेम की मस्ती को बयां करता है, या “तुमसा नहीं देखा” (फिल्म: तुमसा नहीं देखा), जिसमें साहिर की रोमांटिक संवेदना झलकती है।

उनकी पंक्तियाँ आदर्शों की टूटन, समाज की विडंबना और प्रेम की कोमलता को एक साथ बोलती थीं। उनकी कलम विरोध भी करती थी और इंसानियत की लौ बचाए रखती थी। फिल्म प्यासा के “ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है” जैसे गीत इसी घर की दीवारों में गूँजे होंगे, जहां सामाजिक अन्याय पर उनकी तीखी टिप्पणियाँ शब्दों में ढलती थीं। या “अभी ना जाओ छोड़ कर” (फिल्म: हम दोनों), जो प्रेम की उदासी और बेचैनी को इतनी गहराई से व्यक्त करता है कि सुनकर दिल भर आता है।

मां के प्रति समर्पण और व्यक्तिगत जीवन

साहिर का निजी संसार भी इसी घर में बसता था। उन्होंने विवाह नहीं किया। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी मां सरदार बेगम थीं। कहा जाता है कि किसी भी बड़ी चर्चा या निर्णय से पहले वे मां की राय अवश्य सुनते थे। मेहमान बैठे हों, बहस चल रही हो—वे उठकर मां के कमरे में जाते और पूछते, “आप क्या सोचती हैं?” मां के प्रति यह सम्मान उनके व्यक्तित्व की कोमलता को उजागर करता है। जब 1976 में उनकी मां का निधन हुआ, तो साहिर भीतर से खाली हो गए। चार वर्ष बाद, 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका जीवन थम गया।

खामोशी और विरासत

साहिर के जाने के बाद “परछाईयां” पर लंबी खामोशी छा गई। कभी जिन कमरों में संगीत और कविता की गूँज रहती थी, वहां सन्नाटा बस गया। विरासत को लेकर विवाद हुए, विशाल लाइब्रेरी बिखर गई। कुछ पांडुलिपियाँ संयोग से मिलीं, जिन्हें चाहने वालों ने सहेज लिया। आज यह बंगला थोड़ा थका हुआ खड़ा है, जैसे समय की धूल उस पर जम गई हो। फिर भी दीवारें उन शब्दों की आहट संभाले हुए हैं। नेमप्लेट पर लिखे “परछाईयां” को छूते हुए लगता है कि सच्ची कविता दीवारों में नहीं, लोगों की स्मृतियों में रहती है।

शायद इसलिए यह घर आज भी एक स्मारक की तरह खड़ा है, याद दिलाता हुआ कि एक शायर की सच्ची विरासत उसकी कविताएं और लोगों के दिल होते हैं। और जब शब्द दिल से निकले हों, तो वे मुंबई की भीड़ में भी कभी खोते नहीं।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)