नई तकनीकी क्रांति के इस दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक निवेश और सामाजिक संरचना को प्रभावित करने वाला परिवर्तनकारी उपकरण बन चुका है। देश की राजधानी के भारत मंडपम में आयोजित “इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026” ने यह संकेत स्पष्ट कर दिया कि भारत इस परिवर्तन के केंद्र में स्वयं को स्थापित कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार यह आयोजन “भव्य रूप से सफल” रहा और देश को एआई क्षेत्र में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए। यह आंकड़ा आज सिर्फ आर्थिक भरोसे का संकेत नहीं है, यह तो वैश्विक मंच पर भारत की नीति-दृष्टि की स्वीकृति को रेखांकित करता है।
मानव-केंद्रित एआई : भारत की विशिष्ट पहचान
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तुत “मानव एआई” की परिकल्पना इंसानों का, इंसानों द्वारा और इंसानों के लिए एआई को व्यापक वैश्विक समर्थन मिला। इस दृष्टि का सार यह है कि एआई का विकास केवल व्यावसायिक लाभ या तकनीकी श्रेष्ठता तक सीमित न रहे, बल्कि सामाजिक कल्याण, नैतिक मानकों और समावेशी विकास को प्राथमिकता दे। समिट में 70 से अधिक देशों ने अंतिम घोषणा पर हस्ताक्षर किए, जोकि पिछले सम्मेलन से अधिक संख्या है। वस्तुत: यह तथ्य दर्शाता है कि जिम्मेदार और नैतिक एआई पर भारत की पहल को बहुपक्षीय समर्थन प्राप्त हुआ है।
निवेश का अभूतपूर्व प्रवाह: विश्वास का आर्थिक रूप
अश्विनी वैष्णव ने बताया कि अवसंरचना से जुड़े निवेश प्रस्ताव 250 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुके हैं, जबकि डीप-टेक और वेंचर कैपिटल निवेश प्रतिबद्धताएं लगभग 20 अरब डॉलर तक पहुंच गई हैं। इन प्रतिबद्धताओं का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि एआई अवसंरचना में उच्च क्षमता वाले डेटा सेंटर, क्लाउड कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर निर्माण और साइबर सुरक्षा जैसे घटक शामिल होते हैं।
यह निवेश संकेत देता है कि भारत केवल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि एआई समाधान विकसित करने वाला वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय इंजीनियरों और शोधकर्ताओं द्वारा विकसित उच्च गुणवत्ता वाले मॉडल उद्योग जगत के लिए आश्चर्य का विषय बने हैं।
रिकॉर्ड भागीदारी और वैश्विक उपस्थिति
समिट में 5 लाख से अधिक आगंतुकों ने भाग लिया। विश्व के लगभग सभी प्रमुख एआई प्रतिष्ठानों, उद्योग दिग्गजों और स्टार्टअप्स की भागीदारी ने इसे वैश्विक मंच का रूप दिया। प्रदर्शनी में नई तकनीकों, नवाचारों और व्यावहारिक अनुप्रयोगों का प्रदर्शन हुआ। मंत्रिस्तरीय संवाद, लीडर्स प्लेनरी और उद्घाटन सत्रों में चर्चाओं की गुणवत्ता को असाधारण बताया गया।
ढाई लाख विद्यार्थियों की भागीदारी के साथ एक गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना, जो यह दर्शाता है कि भारत एआई को युवा शक्ति से जोड़ने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यह भागीदारी भविष्य की कौशल संरचना को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है।
एआई स्टैक और सॉवरेन मॉडल: रणनीतिक आत्मनिर्भरता
भारत ने एआई स्टैक की पांच परतों के निर्माण की नीति अपनाई है, जिसमें डेटा, प्लेटफॉर्म, मॉडल, एप्लिकेशन और गवर्नेंस शामिल हैं। “सॉवरेन बुके” मॉडल की अवधारणा का उद्देश्य देश के लिए स्वदेशी एआई क्षमताओं का विकास करना है, जिससे रणनीतिक निर्भरता कम हो सके।
एआई सुरक्षा के लिए 12 संस्थानों का नेटवर्क तैयार किया गया है, जो मानकों, शोध और परीक्षण पर कार्य कर रहा है। सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को सुदृढ़ करने के लिए “पैक्स सिलिका” समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। यह पहल चिप निर्माण और संपूर्ण सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
एआई का व्यावहारिक उपयोग: भारत की बढ़त
अमेरिकी कंपनी ओपनएआई के अनुसार तकनीकी कार्यों के लिए चैटजीपीटी के उपयोग में भारत वैश्विक औसत से काफी आगे है। भारत में डेटा विश्लेषण का उपयोग वैश्विक औसत से लगभग चार गुना अधिक है, जबकि कोडिंग के लिए कोडेक्स का उपयोग करीब तीन गुना ज्यादा है। भारतीय उपयोगकर्ता कोडिंग से जुड़े प्रश्न वैश्विक औसत की तुलना में तीन गुना अधिक पूछते हैं और शिक्षा से संबंधित प्रश्न लगभग दोगुने हैं।
साप्ताहिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे भारत अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा बाजार बन गया है। कार्य से संबंधित उपयोग 35 प्रतिशत तक है, जो वैश्विक औसत से अधिक है। इससे स्पष्ट है कि एआई को कार्यालयों में ड्राफ्टिंग, एडिटिंग, तकनीकी सहायता और डिबगिंग के लिए प्रभावी उपकरण के रूप में अपनाया जा रहा है।
युवा शक्ति और जनसांख्यिकीय लाभ
18 से 24 वर्ष आयु वर्ग कुल संदेशों का लगभग आधा हिस्सा भेजता है, जबकि 18 से 34 वर्ष वर्ग 80 प्रतिशत उपभोक्ता संदेशों के लिए जिम्मेदार है। यह जनसांख्यिकीय प्रवृत्ति बताती है कि भारत की युवा आबादी तकनीकी परिवर्तन को तेजी से अपना रही है। भौगोलिक दृष्टि से तेलंगाना, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे तकनीकी केंद्र कोडिंग क्षमताओं के उपयोग में अग्रणी हैं। यह क्षेत्रीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती को दर्शाता है।
वैश्विक सहयोग: ग्लोबल साउथ की आवाज
कनाडा, स्विट्जरलैंड, ब्राजील और अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने भारत की पहल की सराहना की। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला के नेतृत्व में आए बड़े प्रतिनिधिमंडल ने एआई, रक्षा, कृषि और ऊर्जा क्षेत्रों में साझेदारी को ऐतिहासिक बताया। कनाडा के मंत्री इवान सोलोमन ने इसे सभी देशों के लिए खुला मंच बताया। यह सम्मेलन ग्लोबल साउथ के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि तकनीकी क्रांति में विकासशील देशों की भागीदारी सुनिश्चित करना वैश्विक असमानताओं को कम करने का माध्यम बन सकता है।
स्वास्थ्य और नियमन: जिम्मेदार विस्तार की आवश्यकता
डब्ल्यूएचओ की पूर्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल सौम्या स्वामीनाथन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। इमेज रिकग्निशन और पैटर्न एनालिसिस के माध्यम से एक्स-रे और पैथोलॉजी स्लाइड पढ़ने जैसे कार्य विशेषज्ञों की कमी वाले क्षेत्रों में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने एआई उत्पादों के लिए क्लिनिकल ट्रायल, नियामक ढांचा और सुरक्षा मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि तकनीकी विस्तार के साथ गवर्नेंस फ्रेमवर्क का सुदृढ़ होना अनिवार्य है। एआई का लोकतंत्रीकरण तभी सार्थक होगा जब मानक, बेंचमार्क और पारदर्शी नियम लागू किए जाएं।
विश्वास, निवेश और दृष्टि का संगम
अत: यहां निष्कर्ष रूप में यही कहना होगा कि इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत एआई युग में निर्णायक भूमिका निभाने की तैयारी कर चुका है। 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश प्रस्ताव, रिकॉर्ड भागीदारी, वैश्विक समर्थन और युवा शक्ति की सक्रिय उपस्थिति इस परिवर्तन की आधारशिला हैं।
भारत की मानव-केंद्रित नीति, संतुलित विदेश नीति और विशाल प्रतिभा भंडार ने एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें तकनीकी नवाचार सामाजिक जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ सके। एआई का अगला अध्याय केवल एल्गोरिद्म और डेटा तक सीमित नहीं रहेगा; यह विश्वास, सहयोग और समावेशी विकास की कहानी भी लिखेगा। भारत इस कहानी का केंद्रीय पात्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।