रांची, 11 फरवरी । झारखंड में महिला सुपरवाइजर नियुक्ति से जुड़े मामले में आकांक्षा कुमारी सहित अन्य अभ्यर्थियों की ओर से दायर याचिका पर बुधवार को झारखंड उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई।
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता ए.के. मेहता को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को निर्धारित की गई है।
प्रार्थियों की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स, चंचल जैन सहित अन्य ने पक्ष रखा। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की ओर से अधिवक्ता संजय पिपरवाल और प्रिंस कुमार उपस्थित हुए, जबकि राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने पैरवी की।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता राजीव रंजन ने दलील दी कि महिला सुपरवाइजर का पद विशेष रूप से महिला कैडर के लिए सृजित किया गया है, क्योंकि इस पद का कार्यक्षेत्र गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं की माताओं एवं अन्य लक्षित समूहों से संबंधित है। इसी कारण यह पद केवल महिलाओं के लिए निर्धारित किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य राज्यों में भी ऐसी व्यवस्था लागू है।
वहीं, प्रार्थी पक्ष ने तर्क दिया कि नियुक्ति प्रक्रिया में किसी भी वर्ग को शत-प्रतिशत आरक्षण देना विधिसम्मत नहीं है। विज्ञापन में केवल महिलाओं से आवेदन आमंत्रित करना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।
इससे पूर्व न्यायमूर्ति आनंदा सेन की एकल पीठ ने इस मामले को विचारार्थ सक्षम खंडपीठ के समक्ष भेजने का निर्देश दिया था। एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न खंडपीठ को सौंपा है कि क्या किसी पद को शत-प्रतिशत महिलाओं के लिए आरक्षित किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि जेएसएससी ने बाल कल्याण विभाग में महिला सुपरवाइजर के 421 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था। याचिकाकर्ता परीक्षा में शामिल हुए थे, लेकिन आयोग ने यह कहते हुए उनका चयन नहीं किया कि उनकी शैक्षणिक योग्यता विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप नहीं है। अभ्यर्थियों के पास निर्धारित मुख्य विषय के स्थान पर सहायक विषयों में डिग्री है, जबकि नियुक्ति नियमावली में इस संबंध में अलग प्रावधान का उल्लेख है।
मामले में शत-प्रतिशत महिला आरक्षण और शैक्षणिक योग्यता की वैधता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अदालत में विस्तृत बहस जारी है।———-