संगीत और रागों के विषय में केवल गूगल पर भरोसा न करें: यतीन्द्र मिश्र

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जयपुर, 17 जनवरी । लेखक, कवि और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र ने युवाओं से कहा कि वे संगीत और रागों के विषय में केवल गूगल पर भरोसा न करें, क्योंकि वहां कई गलत तथ्य हैं। उन्होंने कहा कि कलाकारों और सर्जकों से बातचीत या प्रामाणिक पुस्तकों के अध्ययन से ही सही जानकारी मिल सकती है।

शहर में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 के तीसरे दिन ‘नैनन में आन बान’ सत्र में शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत की महान हस्तियों के जीवन, उनकी साधना और गायकी की परंपरा पर विस्तृत चर्चा हुई। यह सत्र लेखक, कवि और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र की पुस्तक ‘नैनन में आन बान’ पर आधारित था। सत्र का संचालन वैशाली माथुर ने किया, जबकि संवाद में सुधा मूर्ति, विद्या शाह और प्रेरणा श्रीमाली शामिल रहीं। सत्र की चर्चा का केंद्र घरानों की परंपरा, गायकी की शुद्धता और बदलाव रहा।

सत्र में यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि शास्त्रीय संगीत में शुद्धता का निर्धारण अक्सर गुरु के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। कुछ गुरु परंपरागत शुद्धता पर जोर देते हैं, जबकि कुछ अन्य स्थानों और परंपराओं से श्रेष्ठ तत्व ग्रहण कर नई बंदिश या रचना को महत्व देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोनों दृष्टिकोण भारतीय संगीत की बहुलता और जीवंतता का हिस्सा हैं।

विद्या शाह ने शुद्धता की परिभाषा से आगे बढ़कर साधना और मेहनत पर बल दिया। उनका कहना था कि गुरु द्वारा दी गई रचना को शिष्य अपने रियाज और अभ्यास से आगे ले जाता है। संगीत में शिष्य का काम केवल परंपरा को दोहराना नहीं, बल्कि उसमें अपनी साधना और अनुभव से नई ऊंचाई जोड़ना भी है।

प्रेरणा श्रीमाली ने परंपराओं के परिवर्तनशील स्वरूप पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिष्य चाहे तो गुरु से सीखी रचना को हूबहू प्रस्तुत कर सकता है, लेकिन असली कलाकार वही है जो रचना में अपने दृष्टिकोण और अनुभव को जोड़ता है।

सत्र में संगीत प्रस्तुति भी विशेष थी। विद्या शाह ने बनारस की सुप्रसिद्ध ठुमरी गायिका रसूलन बाई की ठुमरी प्रस्तुत की- “नैनन में आन बान कौनसी पड़ी, साँवरी सी सूरत मोहिनी सी मूरत श्याम सी खड़ी”।

इसके बाद उन्होंने दक्षिण भारतीय भक्ति परंपरा की रचना “कृष्णानी बेगने बारो” और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी विद्याधरी बाई की रचना प्रस्तुत की- “चुन चुन के फूल ले लो अरमाँ, यह रह न जाये, ये हिन्द का बगीचा है गुलज़ार रह न जाये”।

फेस्टिवल में यतींद्र मिश्रा को महाकवि कन्हैयालाल सेठिया अवॉर्ड दिया गया।