देश में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने को तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप करने की मांग, सुप्रीम कोर्ट में याचिका

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याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) को 2019 में शुरु किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत 2024 तक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में 20 से 30 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य था। इसे बढ़ाकर 2026 तक 40 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया। लेकिन यह कार्यक्रम अपने सामान्य लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहा। याचिका में कहा गया है कि देश के लोग अब सांस नहीं ले पा रहे हैं, ऐसे में देश में नेशनल हेल्थ इमरजेंसी घोषित करने का निर्देश दिया जाए।

याचिका में कहा गया है कि अकेले दिल्ली में करीब 22 लाख स्कूली बच्चों को फेफड़ों में इतना नुकसान हो चुका है कि उनकी भरपाई मुश्किल है। याचिका में कहा गया है कि चाहे दिल्ली हो या लखनऊ, मुंबई या कोलकाता , हर जगह की हवा जहर बन चुकी है।

याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार है। ऐसे में कोर्ट प्रदूषण पर सख्त और ठोस कदम उठाए। याचिका में कहा गया है कि सरकार की निगरानी व्यवस्था केवल शहरों तक की सीमित क्यों है। गांवों में वायु गुणवत्ता मापने की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि ग्रामीण आबादी भी प्रदूषण से उतना ही प्रभावित है जितनी शहरी आबादी।