श्री लागुरी ने बताया कि सारंडा के आदिवासी मूलवासी लंबे समय से विस्थापन के विरोध में अपनी आवाज उठा रहे थे। स्थानीय लोगों की मांग थी कि सारंडा क्षेत्र में किसी भी प्रकार का विकास या खनन कार्य उनकी सहमति और संरक्षण नीति के तहत हो तथा मौजूदा बस्तियों को किसी भी परिस्थिति में हटाया न जाए। समिति की ओर से कई बार सरकार और संबंधित विभागों को ज्ञापन भी सौंपा गया था।
महासचिव ने कहा कि राज्य सरकार ने न्यायालय में स्पष्ट रूप से यह मंतव्य रखा कि सारंडा के मूलवासी को विस्थापित नहीं किया जाएगा और उनकी आजीविका, परंपरा तथा सांस्कृतिक पहचान की रक्षा की जाएगी। सरकार के इस पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से लेते हुए सारंडा वासियों के हित में निर्णय दिया है।
उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद समिति ने सर्वसम्मति से 16 नवम्बर को घोषित आर्थिक नाकेबंदी को स्थगित करने का निर्णय लिया है। लागुरी ने कहा कि यह फैसला आदिवासी मूलवासियों के अधिकारों की बड़ी जीत है और इससे यह स्पष्ट होता है कि संघर्ष और संवाद दोनों के माध्यम से समाधान संभव है।
उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सर्वोच्च न्यायालय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार और अदालत ने सारंडा वासियों की चिंताओं को समझा और एक न्यायोचित निर्णय दिया। संवाददाता सम्मेलन में समिति से जुड़े कई पदाधिकारी भी मौजूद थे।