(संशोधित) कन्हर नदी तट पर लोक आस्था का सैलाब, डूबते सूर्य को अर्घ्य देने उमड़ी भक्तों की भीड़

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सांझ ढलते ही घाटों पर हजारों श्रद्धालु हाथों में अर्घ्य लिए सूर्यदेव की आराधना में लीन दिखे। करीब पंद्रह हजार श्रद्धालु इस ऐतिहासिक नदी तट पर पहुंचे। घाटों पर छठ मइया के जयकारे गूंजते रहे, वहीं भक्तिमय गीतों से पूरा वातावरण अलौकिक बना रहा।

दो राज्यों का संगम, एक आस्था की धारा

कन्हर नदी के तट पर हर वर्ष की तरह इस बार भी झारखंड और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती गांवों से हजारों लोग पहुंचे। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में, सिर पर पूजन सामग्री से भरी डालियां लिए श्रद्धा भरे कदमों से घाट की ओर बढ़ती दिखीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई छठ के इस पर्व को लेकर उत्साहित और भाव-विभोर नजर आया।

मंत्री नेताम ने व्रतियों को दी शुभकामनाएं

इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम भी पहुंचे। उन्होंने घाट पर पहुंचकर श्रद्धालुओं से मुलाकात की और छठ व्रतियों को शुभकामनाएं दीं।

रामानुजगंज बना आस्था का केंद्र

कन्हर नदी का यह तट अब सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पहचान बन चुका है। आसपास के जिलों गढ़वा, डालटनगंज, अंबिकापुर और बलरामपुर से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लोगों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ा छठ आयोजन यहीं रामानुजगंज में होता है, जहां दो राज्यों की संस्कृति का संगम एक पवित्र छवि रचता है।

घाटों पर व्यवस्था चाक-चौबंद

प्रशासन, पुलिस और नगर पालिका के कर्मचारियों ने मिलकर पूरे घाट परिसर में विशेष साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था और सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए थे। सुरक्षा व्यवस्था के लिए नगर सेना से अतिरिक्त बल बुलाया गया था। महिलाओं और बुजुर्गों की सुविधा के लिए अलग से व्यवस्था की गई।

भोर में होगा उगते सूर्य को अर्घ्य

डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद अब सभी व्रती कल यानी मंगलवार की भोर में उगते सूर्य को अर्घ्य देने की तैयारी में जुट गए हैं। इसी के साथ छठ महापर्व की पूर्णाहुति होगी।

कन्हर नदी तट का यह पावन दृश्य एक बार फिर साबित करता है कि लोक आस्था और संस्कृति की जड़ें आज भी समाज के हर वर्ग में उतनी ही गहरी हैं जितनी सदियों पहले थीं।