देश के जाने -माने वरिष्ठ व्यंग लेखक प्रेम जनमेजय ने कहा कि वर्तमान समय में व्यंग्य विधा में ठहराव के लिए, इस पर गंभीर विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। यह बातें उन्हाेंने साहित्य अकादमी की ओर से शनिवार को आयाेजित व्यंग्य पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ के संयुक्त तत्त्वावधान में “हिंदी व्यंग्य का संक्रमण काल” विषय पर एक परिसंवाद का आयोजन में कही। इस कार्यक्रम का उद्देश्य वर्तमान पीढ़ी के लेखको काे व्यंग साहित्य के प्रति जागरूक कराना है।
प्रेम जनमेजय ने कहा, “भारतेंदु से लेकर हरिशंकर परसाई, शरद जोशी एवं रवींद्रनाथ त्यागी जैसे कई लेखकों ने इस (व्यंग) वंचित विधा को अपनी लेखनी में जगह दी है।” उन्होंने प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी को व्यंग साहित्य का पक्षधर बताया।
साहित्य अकादमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा, “ असली व्यंग्यकार तो वे हैं जो चपत तो खुद को लगाते है लेकिन उसकी छाप समाज के गाल पर छपती है। शब्द हमेशा विरोध में खड़े रहते हैं। भाषा की तुर्शी को बनाए रखने के लिए व्यंग्य बहुत जरूरी है।”
साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा, “हमारे पुराने वैदिक साहित्य से लेकर आधुनिक समय तक व्यंग्य साहित्य हमेशा स्थान पाता रहा है।”
परिसंवाद का प्रथम सत्र का विषय “इक्कीसवीं सदी की दस्तक : परिदृश्य और चुनौतियां” पर आधारित था, जिसकी अध्यक्षता ज्ञान चतुर्वेदी ने की। इस सत्र में यशवंत व्यास, प्रभात रंजन, गौतम सान्याल और राकेश पाण्डेय ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
“व्यंग्य का विस्तृत आकाश” विषय पर केन्द्रित द्वितीय सत्र की अध्यक्षता लीलाधर मंडलोई ने की। इस सत्र में प्रताप सहगल, गिरीश पंकज, संजीव कुमार और रमेश सैनी ने क्रमशः नाटक, कविता, आलोचना और उपन्यास के सन्दर्भ में अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। शाम को व्यंग्य यात्रा द्वारा संयोजित ‘व्यंग्य रचना पाठ’ सत्र भी आयोजित किया गया।
इस सत्र में अकादमी के उपसचिव देवेन्द्र कुमार देवेश, आलोक पुराणिक, कृष्ण कुमार आशु, बलराम अग्रवाल, संदीप अवस्थी, फारूक अफरीदी, राजेश कुमार, प्रेम विज, एम एम चंद्रा, अलंकार रस्तोगी, अर्चना चतुर्वेदी और स्वाति चौधरी सहित कई अतिथि मौजूद थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं का पाठ किया।