भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है आतंकवाद। यह चुनौती देखा जाए तो सीमा पार से आने वाली गोलियों और बारूद से कहीं अधिक खतरनाक और विध्वंसक है, क्योंकि इसमें एक खास विचारधारा भी है जो देश के भीतर युवाओं के दिमाग में धीरे-धीरे जहर भर रही है। हाल ही में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और सेंट्रल एजेंसियों ने जिस टेरर मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। उसमें दिल्ली, झारखंड, तेलंगाना और मध्य प्रदेश से पांच संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया है। संदिग्ध आतंकियों के पास से बम बनाने की सामग्री और हथियार मिले हैं। ये सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तानी हैंडलर्स के संपर्क में थे। वस्तुत: इनकी गिरफ्तारी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि भारत की धरती पर इस्लामिक आतंकवाद की जड़ें फैलाने की कोशिशें लगातार तेज हो रही हैं।
गिरफ्तारी का नेटवर्क और पाकिस्तान की भूमिका
सुरक्षा एजेंसियों के संयुक्त अभियान में चार से पाँच राज्यों में छापेमारी की गई और आठ से अधिक लोगों से पूछताछ हुई। पुलिस ने साफ किया कि इन संदिग्धों के संबंध पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क से हैं और सोशल मीडिया के जरिए यह लोग लगातार विदेशों में बैठे आकाओं के संपर्क में थे। जांच एजेंसियों ने जो साक्ष्य एकत्र किए हैं, वे यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि भारत को अस्थिर करने के लिए एक संगठित प्रयास चल रहा है। अशरफ दानिश नाम का शख्स इस पूरे नेटवर्क का प्रमुख सदस्य बताया गया। वह भारत में रहकर आतंकी मॉड्यूल का संचालन कर रहा था, साथ ही मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें आतंकी गतिविधियों की तरफ आकर्षित करने की भूमिका भी निभा रहा था।
इस दौरान पुलिस के ध्यान में यह भी आया कि इसके लिए सोशल मीडिया एक सशक्त माध्यम था जहां से ये अपनी आतंकी विचारधारा को आसानी से फैला सके। अब बार-बार इस तरह की घटनाओं को देखकर ये विश्वास हो चला है कि आज का आतंकवाद केवल बम, बारूद और हथियारों से नहीं लड़ता। उसका असली युद्धक्षेत्र युवाओं का दिमाग है। फेसबुक, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आतंकियों के लिए एक हथियार बन गए हैं। इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) पहले ही यह साबित कर चुका है कि “वर्चुअल खलीफत” का सपना इंटरनेट के जरिए दुनिया भर के युवाओं को प्रभावित करके फैलाया जा सकता है। भारत में भी इसी तर्ज पर गुप्त ऑनलाइन समुदाय बनाए जा रहे हैं, जहाँ सांप्रदायिक नफरत, धार्मिक कट्टरता और हिंसक विचारधाराओं को परोसा जा रहा है। यही तो इस बार पकड़े गए इन संदिग्धों के पास से भी ये पैटर्न सामने आया है।
भारत की संवेदनशील जमीन और अतीत की त्रासदियाँ
भारत पूर्व भी आतंकवाद की मार झेल चुका है। 1993 के मुंबई धमाकों से लेकर 2001 के संसद हमले और 2008 के 26/11 हमलों तक हर बार जांच में पाकिस्तान-आधारित नेटवर्क का हाथ सामने आया। पुलवामा का कायराना हमला भी अब तक नहीं भुलाया जा सका। इन घटनाओं की पृष्ठभूमि बताती है कि भारत बार-बार आतंकवाद का निशाना बनता है और अब नए मॉड्यूल्स सोशल मीडिया के जरिए खड़े किए जा रहे हैं। चिंता इसलिए भी ये बड़ी है, क्योंकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी वाला देश है। यहाँ करोड़ों मुसलमान रहते हैं, जिनमें से भारी बहुमत शांतिप्रिय और कानून का पालन करने वाले नागरिक हैं। लेकिन समस्या यह है कि उनमें से ही एक वर्ग आतंकी संगठनों की नजर में आता है। वह हिंसा और गैर मुसलमानों के खिलाफ कार्य करता है, जिसे वह जिहाद की संज्ञा देता है।
पहले तो चलो; कहा जाता था कि मुसलमानों में बेरोजगारी अधिक है, इसलिए युवा भटक जाते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में सामने आए आर्थिक आंकड़ें तो यही बता रहे हैं कि अब देश में बहुसंख्यक हिन्दू और मुसलमानों के बीच आर्थिक और सामाजिक असमानता न के बराबर रही है। अपनी जनसंख्या के अनुपात में मुसलमानों की स्थिति कई जगह हिन्दुओं से भी बेहतर हुई है। तब फिर यह प्रश्न ही समाप्त हो जाता है कि मुसलमान युवा को बेरोजगारी के नाम पर भटकाया जा रहा है। यानी कोई अन्य तत्व अवश्य ऐसे मौजूद हैं, जोकि मुस्लिम युवा को आतंकवादी बनने के लिए प्रेरित करते हैं! ऐसे में स्वभाविक है कि इस तरह के तत्वों को खोजा जाए, किंतु ये कार्य करे कौन ?
इस्लामी संगठनों की बढ़ती जिम्मेदारी
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है; जब देश के भीतर युवाओं को गुमराह करने की कोशिशें हो रही हैं, तब इस्लामिक संगठनों की भूमिका क्या है? भारत में मुसलमानों के पास अपने कई बड़े और प्रभावशाली संगठन हैं। ये संगठन केवल धार्मिक मामलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी मुखर भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे आतंकवाद और कट्टरपंथ के मुद्दे पर भी साफ और दृढ़ रुख अपनाएँ।
जमीयत उलमा-ए-हिन्द और जिम्मेदारी का सवाल
1919 में स्थापित जमीयत उलमा-ए-हिन्द भारत का सबसे पुराना और बड़ा मुस्लिम संगठन है। यह दारुल उलूम देवबंद से जुड़ा माना जाता है। यह संगठन धार्मिक मार्गदर्शन, सामाजिक न्याय और कानूनी सहायता में सक्रिय रहता है। लेकिन सवाल यह है कि जब देश की सुरक्षा पर सीधा हमला हो रहा है, तो क्या जमीयत खुलकर आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होता है? क्या यह संगठन युवाओं को संदेश देता है कि आतंकवाद इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है?
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की सीमाएँ
1973 में बना ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हमेशा पर्सनल लॉ यानी शरीअत से जुड़े मुद्दों-तलाक, निकाह, विरासत-पर सरकार और अदालतों के सामने खड़ा दिखता है। लेकिन आतंकवाद और कट्टरपंथ जैसे बड़े मुद्दों पर इसकी चुप्पी अक्सर सवाल खड़े करती है। जब यह बोर्ड तलाक-ए-हलाला या तीन तलाक पर घंटों बहस करता है, तब यह क्यों नहीं कहता कि आतंकवाद मुसलमानों की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है और इसे जड़ से खत्म करना होगा? क्यों नहीं ये अपने समाज के लिए जनजाति का अभियान लेता ?
जमात-ए-इस्लामी हिन्द की विचारधारात्मक जिम्मेदारी
1941 में बनी जमात-ए-इस्लामी हिन्द अबुल आला मौदूदी की विचारधारा से प्रभावित है। यह संस्था शिक्षा और सामाजिक कार्यों में सक्रिय है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि इसकी विचारधारात्मक पृष्ठभूमि कहीं-न-कहीं कट्टरपंथ की जड़ों से जुड़ी है। ऐसे में इस संगठन की जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है कि यह साफ और सख्त शब्दों में आतंकवाद का विरोध करे और युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पहल करे।
देवबंद और नदवा की भूमिका
दारुल उलूम देवबंद 1866 में स्थापित एक मशहूर मदरसा है। यह इस्लामी शिक्षा और फिक़्ह का बड़ा केंद्र है, जिसकी गूँज पूरी दुनिया में सुनाई देती है। नदवतुल उलमा, लखनऊ भी पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा को जोड़ने की कोशिश करता है। यदि ये दोनों संस्थान साफ-साफ यह कहें कि आतंकवाद और हिंसा इस्लाम के खिलाफ हैं और इसे फैलाने वाले लोग गुनहगार हैं, तो यह संदेश न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के मुसलमानों तक जाएगा।
राजनीतिक संगठनों की भूमिका
ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरत जैसे संगठन मुस्लिम समाज की राजनीतिक आवाज के रूप में सामने आते हैं। लेकिन जब आतंकवाद की बात आती है, तो इन संगठनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने राजनीतिक भाषणों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दें। यदि एआईएमआईएम जैसे संगठन साफ शब्दों में आतंकवाद को नकारें और समुदाय को सतर्क करें, तो यह देश के लिए सकारात्मक संदेश होगा। वस्तुत: इन सभी संगठनों के लिए यह आवश्यक है कि अपनी जमात को बार-बार समझाएं; गैर मुसलमान के प्रति जिहाद इस्लाम के विरोध में है! क्या इन्हें ये बात नहीं समझानी चाहिए, वैसे तो कहेंगे कि इस्लाम शांति का रिलीजन, मजहब है!
यह मुस्लिम समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी है
आतंकवादियों की संख्या चाहे कितनी भी कम हो, उनका असर पूरे समुदाय की छवि पर पड़ता है। इसलिए मुस्लिम समाज की जिम्मेदारी है कि वह आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो। इस्लामी संगठनों को आगे आकर यह कहना चाहिए कि आतंकवाद इस्लाम का प्रतिनिधि नहीं है। यह धर्म की गलत व्याख्या है और इसके खिलाफ सामूहिक मोर्चा खोलना जरूरी है। यदि संगठन चुप रहते हैं तो यह चुप्पी आतंकियों के लिए मौन समर्थन मानी जाएगी। केवल कश्मीर घटना के बाद कुछ जगह विरोध प्रदर्शन करने से काम नहीं चलनेवाला है, इस्लामी संगठनों को चाहिए कि वे युवाओं के बीच जाकर उन्हें जागरूक करें, सोशल मीडिया पर फैल रहे जहरीले प्रचार का जवाब दें। यदि इस्लामिक संगठन अब भी अपनी जिम्मेदारी से भागते रहे और आतंकवाद पर ढुलमुल रवैया अपनाते रहे तो यह देश के भविष्य के लिए खतरनाक होगा। समय की मांग है कि जमीयत, पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-इस्लामी, देवबंद और नदवा जैसे संगठन साफ और सख्त शब्दों में आतंकवाद के खिलाफ खड़े हों और यह संदेश दें कि भारत में मजहब नहीं, इंसानियत सर्वोपरि है। जिसका पालन हर मुसलमान को करना अनिवार्य है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)