कथाओं के अनुसार, द्वापर काल में कृष्ण ने लड़कियों से कहा था कि वे अपने पूर्वजों के तर्पण और स्मरण हेतु विशेष अनुष्ठान करें। तभी से यह परंपरा शुरू हुई, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आज तक चली आ रही है। महाबुलिया पर्व मुख्यतः किशोरियों और युवतियों द्वारा मनाया जाता है। सायंकाल वे अपने घर के दरवाजे को गोबर से लीपकर पवित्र बनाती हैं और कांटों पर रंग-बिरंगे फूल सजाती हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना कर वे प्रतीक रूप में अपने पूर्वजों की आत्मा को तर्पण अर्पित करती हैं। पूजा के बाद यह पुष्प-व्यवस्था तालाब, नदी या जलाशय में विसर्जित की जाती है। इस त्योहार में पूर्वजों की स्मृति, प्रकृति के प्रति आस्था और लोक परंपरा की गहरी झलक दिखाई देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दिन लड़कियों के लिए विशेष माना जाता है। वे समूह बनाकर गीत गाती हैं और पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती हैं। हालांकि, आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी के चलते यह त्योहार अब केवल बुन्देलखण्ड क्षेत्र तक सिमट कर रह गया है। शहरों और अन्य प्रांतों में इसका नाम तक अनसुना है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले यह पर्व बड़े उत्साह के साथ पूरे इलाके में मनाया जाता था, लेकिन अब यह केवल परंपरा निभाने तक सीमित रह गया ळें फिर भी, महाबुलिया बुन्देलखण्ड की अद्वितीय सांस्कृतिक पहचान है, जो इस क्षेत्र की लोक आस्था, सामूहिकता और पुरातन संस्कारों को आज भी जीवित रखे हुए है।