वैश्विक दबावों के बीच देश की छवि पर ही चोट करने में लगे कुछ विपक्षी नेता

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पिछले कुछ वर्षों में भारत वैश्विक मंच पर जिस तरह सशक्त आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा, वह न केवल उसकी नेतृत्व क्षमता का परिणाम है बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायतता और व्यापारिक कुशलता की पुष्टि भी है। ऐसे समय में जब वैश्विक भू-राजनीति अपने अस्थिरता के दौर से गुजर रही है; विशेष रूप से अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और ऊर्जा संकट के संदर्भ में दुनिया के कई देशों के बीच आपसी तालमेल। ऐसे में भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता पर रखते हुए अनेक संतुलन साधे है। लेकिन दुर्भाग्यवश, इस संतुलन को बार-बार कमजोर करने का काम बीते कुछ समय से लगातार विपक्ष द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, जिसमें कि भारत की आर्थिक छवि को दांव पर लगाने का काम हुआ है।

वैसे यह सच है कि राजनीतिक विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन जब यह विरोध ऐसे मोड़ पर पहुंच जाए कि वह विदेशी ताकतों के साथ ‘सुर में सुर’ मिलाने लगे और राष्ट्र की छवि को धूमिल करने लगे, तब यह अवश्‍य चिंता का विषय बन जाता है। आज राहुल गांधी के बयानों का समर्थन करनेवालों को यह बात जरूर याद रखनी चाहिए। वस्‍तुत: इस पूरे परिदृश्य में जब भारत की ओर से कूटनीतिक स्तर पर समाधान की कोशिशें चल रही हैं, उसी समय विपक्षी नेताओं द्वारा ‘आर्थिक गुलामी’, ‘घुटने टेकना’, ‘विदेश नीति विफल’ जैसे जुमलों का प्रयोग कर देश की संप्रभुता और आर्थ‍िकी पर सवाल उठाना राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल प्रतीत होता है।

अभी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा देश की सुरक्षा पर प्रश्‍न उठाने के बाद आर्थ‍िकी को कटघरे में खड़ा करने का बयान पुराना भी नहीं हुआ कि एक बार फिर उन्‍होंने कहा है कि ‘प्लीज भारत ये समझने की कोशिश करे कि प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति ट्रंप की बार-बार की धमकियों के बावजूद, उनके सामने खड़े नहीं हो पा रहे हैं। इसका कारण अडानी के खिलाफ चल रही अमेरिकी जांच है।’ राहुल की तरह समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव भी केंद्र सरकार पर तंज कसते हुए कह रहे हैं कि हमारी विदेश नीति ही विदेश चली गई है।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी का यह दावा कि ट्रंप के सामने प्रधानमंत्री मोदी खड़े नहीं हो पा रहे हैं, या इससे पहले यह बयान देना कि “भारत की अर्थव्यवस्था मर चुकी है” और “मोदी सरकार ने इसे खत्म कर दिया है”, वास्‍तव में घोर आपत्‍त‍ि जनक है। क्‍योंकि उनके इस तरह के बयान देश की आर्थिक साख को वैश्विक मंच पर कमजोर करने का काम ही कर रहे हैं। आश्‍चर्य तो यह होता है कि अपने इस दावे के समर्थन में जिस तरह से ‘अडानी-मोदी साझेदारी’, नोटबंदी, त्रुटिपूर्ण जीएसटी, एमएसएमई संकट और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को गिनाते हैं, उनके कोई अधिकारिक आंकड़े आज तक प्रस्‍तुत नहीं कर सके हैं। दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत पर 25% टैरिफ लगाने की धमकी कोई छोटी बात नहीं है। लेकिन जिस तरह कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत सरकार पर आरोप लगाने शुरू किए हैं, वह एक गहरी राजनीतिक चूक को ही आज दर्शा रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत की विदेश नीति आज पहले से कहीं अधिक रणनीतिक, स्वायत्त और बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय हुई है।

ट्रंप के आरोप और अडानी को घसीटना

राहुल गांधी ने अपने हालिया बयानों में ट्रंप द्वारा दिए गए संकेतों और अडानी समूह के खिलाफ अमेरिका में कथित जांच को आपस में जोड़ते हुए कहा कि “मोदी इसलिए ट्रंप के सामने चुप हैं क्योंकि अडानी के खिलाफ मामला चल रहा है और दोनों के वित्तीय रिश्ते उजागर हो सकते हैं।” यह कहना न केवल अडानी समूह के खिलाफ बिना सबूत के अंतरराष्ट्रीय मंच पर आरोपों को मजबूती देना है, बल्कि देश के प्रधानमंत्री की साख पर भी सीधा प्रहार है। भारत की वैश्विक छवि, निवेशकों का विश्वास और रणनीतिक निर्णय-क्षमता इन बयानों से प्रभावित होती है। निवेशक समुदाय ऐसी अस्थिर राजनीतिक टिप्पणियों को आर्थिक जोखिम के रूप में देखता है, जिससे भारत में निवेश का माहौल प्रभावित हो सकता है।

आज राहुल गांधी को लेकर आश्‍चर्य तो इस बात का भी होता है कि भले ही वे नेता प्रतिपक्ष हैं, किंतु उनके बयान कितने अधिक बचकाने हैं । लगभग हर साल राहुल गांधी ने कम से कम एक बयान ऐसा जरूर दिया है, जो बाद में झूठा साबित हुआ और मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, तो वहां से भी उन्हें सिर्फ फटकार मिली है। इस संदर्भ में उनके ये बयान प्रमुखता से देखे जा सकते हैं। “भारत अब ‘संघीय’ नहीं, ‘राज्यविहीन’ गणराज्य है”, “भारत अब चीन और पाकिस्तान से दो मोर्चों पर घिर चुका है और यह प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की विफलता है।”

यूक्रेन युद्ध में भारत की ‘तटस्थ’ नीति को लेकर राहुल का कहना रहा कि “भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने दम पर नहीं खड़ा हो पा रहा है क्योंकि उसकी विदेश नीति अब स्वतंत्र नहीं रही।” यह बयान पश्चिमी देशों के दबावों के बीच भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े करता प्रतीत हुआ। लंदन दौरे पर जब राहुल जाते हैं तो वहां कहते हैं कि “भारत में अब संस्थाएं बर्बाद हो चुकी हैं, यहाँ लोकतंत्र सिर्फ दिखावे के लिए है।” इसे विदेशी भूमि पर भारत की छवि को धूमिल करने वाला बयान माना गया और संसद में इस पर विरोध दर्ज किया गया। इसी तरह से आज जब यूरोपीय देश, अमेरिका इत्‍यादि जिस मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगाने के लिए विचार कर रहे हैं, उस इस्‍लामिक जिहादी कट्टरपंथी संगठन के लिए राहुल कहते हैं, “मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा में दम है।” वे मुस्लिम ब्रदरहुड को लोकतांत्रिक आंदोलन के रूप में स्‍थापित करते हुए दिखते हैं।

क्या विपक्ष आर्थिक विषयों को नहीं समझता?

यह प्रश्‍न हर उस भारतीय का है जो अपने देश को हर तरीके से मजबूत स्‍थ‍िति में देखना चाहते हैं। किंतु राहुल गांधी के व्‍यवहार से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारतीय विपक्ष खासकर राहुल और अखिलेश जैसे नेता आर्थिक नीति, वैश्विक व्यापार, भू-राजनीतिक रणनीति और वित्तीय प्रबंधन जैसे विषयों पर एक परिपक्व दृष्टिकोण से बात नहीं करते। इनके वक्तव्यों में आंकड़ों की कमी, नीतिगत विश्लेषण का अभाव और वैश्विक संदर्भों की अनदेखी दिखती है। इनके बयान भावनात्मक हैं, तथ्यों से रहित हैं और राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक मंचों पर भारत को वैश्विक दक्षिण का नेतृत्वकर्ता, डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप हब के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और जब भारत जी-20 जैसे अवसरों का लाभ उठाकर निर्णायक की भूमिका में आ रहा है; तब ऐसी टिप्पणियां जो “देश खत्म हो गया”, “विदेश नीति खत्म हो गई”, “आर्थिक गुलामी” इत्‍यादि यही कहती हैं, वे देश के भीतर नकारात्मक माहौल बनाकर भारत की उभरती भूमिका को कमजोर करने में लगे हुए हैं। आज राहुल जैसे भारतीय नेताओं को यह समझ क्‍यों नहीं आता कि विश्व अब भारत की नीतियों को गम्भीरता से लेता है। एक सांसद या पूर्व मुख्यमंत्री का बयान अब केवल स्थानीय अखबार की हेडलाइन नहीं बनता, वह वॉल स्ट्रीट, बीजिंग, ब्रुसेल्स और वॉशिंगटन में पढ़ा और विश्लेषित होता है। इसलिए कहना यही होगा कि देश के अंदर से आए इन जैसे बयानों के ज़रिए भारत की आत्मघाती छवि गढ़ना वास्‍तव में आज एक बड़ी भूल है, जिसे संविधानिक संस्‍थाओं के माध्‍यम से तुरंत रोका जाना चाहिए।