प्रशासनिक सुधार की शुरुआत दिल्ली से हो

Share

आजादी के बाद से ही दिल्ली शासन की प्रयोग स्थली बनी हुई है। कम अधिकारों वाली विधानसभा, दिल्ली नगर निगम, महानगर परिषद और 1993 के बाद से दिल्ली विधानसभा से मूल रूप से दिल्ली की शासन व्यवस्था चलती रही है। बावजूद इसके दिल्ली केन्द्र शासित प्रदेश ही रही। जो अधिकार आजादी के समय मुख्य आयुक्त के पास थे वे आज कमोबेश दिल्ली के उप राज्यपाल के पास हैं। दोनों ही केन्द्र सरकार से नियुक्त होते हैं। जाहिर है कि उनकी वफादारी केन्द्र की सरकार के प्रति रहती है।

1911 में दिल्ली देश की राजधानी बनी और 1915 में जमनापार के 65 गांव दिल्ली में शामिल किए गए। तब से आज तक दिल्ली 1483 वर्ग किलोमीटर की बनी हुई है। आबादी के दबाव से दिल्ली बेहाल हो गई है। कायदे में देश की राजधानी और एक शहर वाले इस राज्य को शासन के नजरिए से आदर्श बनाया जा सकता है, जिसका देश के दूसरे राज्य अनुशरण करें लेकिन वास्तव में अब तक से ज्यादातर प्रयोग शासन को अनुपयोगी बनाने के लिए किए जाते रहे हैं। दिल्ली की जनता दिल्ली के विधायक चुनती है जबकि दिल्ली की जमीन का मालिक केन्द्र सरकार के अधीन बनी दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को बना दिया गया है। दिल्ली के ज्यादातर सरकारी कर्मचारी केन्द्रीय चयन आयोग के माध्यम से चुने जाते हैं लेकिन उनमें घालमेल करके उनकी उपयोगिता कम कर दी गई। परिणाम यह हुआ कि पासपोर्ट बनाने और संपत्ति कर के अलावा कोई भी बड़ा काम आज भी पूरी तरह से न तो दलालों से मुक्त हो पाया और न ही सही मायने में आनलाइन हो पाया। सुनने में यह कठोर शब्द है लेकिन वास्तव में अधिकारियों और कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग आज भी जन सुविधाओं को आनलाइन न करने के प्रयास में जुटा हुआ है।

27 साल लंबे इंतजार के बाद दिल्ली में रेखा गुप्ता की अगुवाई में बनी भाजपा सरकार के लिए प्रशासनिक सुधार दिल्ली में उपलब्धियों के मामले में बड़ी लकीर खींचने का अवसर है। यह दिल्ली जैसे छोटे राज्य में केन्द्र सरकार के सहयोग से संभव है। इतना ही नहीं एक बड़ा का यह रोल माडल देश भर के लिए बन जाएगा। यह समझ से परे है कि दिल्ली के विकास के लिए योजनाएं बनाने वाला डीडीए दिल्ली का मालिक कैसे बन गया। अभी की स्थिति में दिल्ली सरकार विकास के काम के लिए दिल्ली की जमीनों का अधिग्रहण करके डीडीए को सौंप देती है। फिर उसी जमीन को स्कूल, कालेज, अस्पताल, सामुदायिक केन्द्र आदि जरूरी चीजों के लिए ऊंची कीमत पर काफी प्रयास करके डीडीए से जमीन खरीदती है। इस प्रक्रिया में काफी समय और धन की बर्बादी होती है। यह समझ से परे है कि अपनी ही जमीन का अधिग्रहण करके उसे डीडीए को क्यों दे और फिर उसी जमीन को ज्यादा दाम में डीडीए से खरीदे। जबकि डीडीए पहले ही मास्टर प्लान के साथ-साथ जिला प्लान आदि बना चुका है। बताते हैं कि दिल्ली की जमीन से बने डीडीए के लैंडबैंक के पास हजारों करोड़ रुपए पड़े हुए हैं, जिनका उपयोग दिल्ली के विकास कामों पर किया जा सकता है।

इससे भी अजूबा काम दिल्ली के सरकारी कामों की रीढ़ की हड्डी माने जानेवाले दास कैडर (दिल्ली के सभी विभागों के कर्मचारी-दिल्ली एडमिनिस्टैटिव सर्विस) के कर्मचारी ही दिल्ली का कामकाज करते हैं। इनका चयन भारत सरकार का कर्मचारी चयन आयोग से होता है। इनके शुरू से दो हिस्से होते हैं -विभागीय (मिनिस्ट्रीयल) और कार्यकारी (एक्सक्यूटीव)। दोनों की लिखित परीक्षा एक साथ होती है लेकिन साक्षात्कार और प्रशिक्षण अलग-अलग होता है। विभागीय कर्मचारी कनिष्क- वरिष्ट लिपिक(एलडीसी, यूडीसी) मुख्य लिपिक(हेड क्लर्क) के पदों पर पदोन्नति पाते हुए सुपरिटेंडेंट (कार्यालय अधीक्षक) बनते हैं। उसी तरह कार्यकारी विंग के कर्मचारी- उप निरीक्षक, निरीक्षक और सहायक आयकर अधिकारी तक बनते हैं। बाद में वरिष्ठता के आधार पर प्रादेशिक सेवा के अधिकारी(दानिक्स) भी बनते हैं। दोनों विंग के कर्मचारियों को दानिक्स कोटे के आधे-आधे पद मिलते रहे हैं। दोनों विंग के कर्मचारी अपने काम की विशेषता हासिल करते रहे हैं। संख्या ज्यादा विभागीय कर्मचारियों की होती थी, इसलिए उनमें प्रमोशन कम होते थे लेकिन दोनों ही तरह के कर्मचारी अपने काम में दक्ष होते थे।

बताते हैं कि 1981-82 में विभागीय कर्मचारियों के कुछ लोगों के दबाव में तब के मुख्य सचिव ने दोनों को मिला दिया। जिससे दोनों के दानिक्स में प्रमोशन समान हों। इसके चलते कर्मचारियों की विशेषज्ञता समाप्त हो गई। जितने कर से जुड़े विभाग हैं उनके बारे में फिल्ड में जाने वाले उप निरीक्षक और निरीक्षक अपने इलाके की पूरी जानकारी रखते थे। वे काम ईमानदारी से करें या न करें लेकिन उन्हें अपने इलाके के बारे में पूरी जानकारी रहती थी। उनकी जानकारी का विभाग को फायदा मिलता था। उसी तरह से कार्यालय अधीक्षक को अपने दफ्तर की एक-एक फाइल की जानकारी होती थी। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी भी दफ्तर से पुराने रिकार्ड जुटाना कठिन है। कहीं मास्टर फाइल नहीं मिलेगी जिससे पूरे विभाग का पता चल सके। उसी तरह बिक्री कर, आबकारी, आयकर, परिवहन आदि करों जुड़े हर मामले के लिए पूरे विभाग को लगना पड़ता है। फिर भी सही जानकारी नहीं मिल पाती है। इतना ही नहीं इसके चलते दफ्तरों से विशेषज्ञता चली गई है। उसकी बहाली निगरानी के साथ जरूरी है। अनेक विभागों में आला पदों पर रहे पूर्व आईएएस अधिकारी एके सिंह बताते हैं कि पुरानी व्यवस्था को बहाल कराकर एक बड़े प्रशासनिक सुधार की शुरुआत की जानी चाहिए। यह ज्यादा कठिन काम नहीं है लेकिन इससे दिल्ली की शासन व्यवस्था में चमत्कारी परिवर्तन होगा। वास्तव में आज जमाना विशेषज्ञता का है।

इस बदलाव का असर दफ्तरों से फाइल का बोझ कम करके सरकारी सुविधाओं को वास्तव में आनलाइन किया जा सकता है। देशभर की अनेक राज्य सरकारों के साथ-साथ दिल्ली में भी अनेक सेवाएं आनलाइन करने के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन वास्तव में अभी भी अनेक विभाग दलालों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। कई विभागों में तो आनलाइन काम भी दलाल ही करवा सकते हैं। उसी तरह हर विभाग में काम का बंटवारा किया जाना चाहिए, यानी किस काम को किस स्तर तक के कर्मचारी को करना है। किसी कर्मचारी को तय मानकों के हिसाब से भविष्य निधि का पैसा निकालने या अपनी छुट्टी मंजूर करवाने के लिए नीचे से ऊपर तक फाइल को क्यों भेजना जरूरी है। हर कर्मचारी का काम साफ-साफ तय होना चाहिए। अभी तो ज्यादातर दफ्तरों में हर फाइल एलडीसी से शुरू होकर विभाग प्रमुख तक जाता है। इससे न केवल दूसरे कामकाज प्रभावित होते हैं बल्कि हर काम में देरी होती है।

आज के समय में भी दिल्ली जैसे राज्य में भी आनलाइन काम न होकर फाइलों का बोझ बढ़ाना सही मायने में राज्य और समाज को सालों पीछे ले जाना है। सालों से इस आनलाइन के नाम पर करोड़ों-अरबों खर्च हो चुके हैं फिर भी सरकारी दफ्तर दलालों के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाया है। पासपोर्ट बनना आनलाइन इसलिए भी सफल हुआ माना जा रहा है क्योंकि उसकी जिम्मेदारी एक सही निजी कंपनी के पास है। कायदे में अगर अब भी प्रशासनिक सुधार का काम नहीं हुआ तो दिल्ली दूसरे देशों की राजधानी की कौन कहे अपने देश के भी कई शहरों से और पिछड़ जाएगी। कायदे में उसे देश की राजधानी की तरह देश का अव्वल शहर बने रहना चाहिए। दिल्ली की भाजपा सरकार के लिए प्रशासनिक सुधार एक बड़ा अवसर भी है। ऐसा करके मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की टीम दिल्ली में ठोस बदलाव करने की बड़ी लकीर खींच सकती हैं। बहुशासन प्रणाली वाली दिल्ली के हर शासन पर भाजपा ही काबिज है। सभी के बीच तालमेल करके इसे मुकाम तक ले जाने का यह मौका इस राज्य सरकार को मिला है।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)