बैठक में 96 से अधिक उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सभी ने एक स्वर में सरकार से आग्रह किया कि प्रिंटिंग और पैकेजिंग उद्योग को 5 प्रतिशत के जीएसटी स्लैब में शामिल किया जाए, ताकि क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता, रोजगार सृजन और निर्यात क्षमता को मजबूती मिल सके।
जीएसटी कानून विशेषज्ञ एन.के. थमन ने बैठक में कहा, “प्रिंटिंग और पैकेजिंग भारत की आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा है। यदि इस क्षेत्र को 18% के स्लैब में रखा गया, तो इससे नवाचार में रुकावट, लागत में वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में गिरावट आ सकती है।”
चार्टर्ड अकाउंटेंट उदय धोटे, जो एक प्रिंट उद्यमी भी हैं, उन्होंने कहा, “उच्च टैक्स दरों से छोटे व्यवसायों पर बोझ बढ़ेगा, जिससे जरूरी पैकेजिंग उत्पादों की लागत में इजाफा होगा और इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।”
उद्योग का आर्थिक योगदान और संभावनाएं
भारत का प्रिंटिंग और पैकेजिंग उद्योग वर्ष 2025 तक 150 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की राह पर है। पैकेजिंग खंड अकेले साल 2025 में 101 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर सकता है और साल 2030 तक यह 10.73% की वार्षिक वृद्धि दर के साथ 170 अरब डॉलर तक पहुँचेगा। यह क्षेत्र देश के 2.5 मिलियन से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार देता है और अप्रत्यक्ष रूप से कागज, स्याही और लॉजिस्टिक्स जैसे सहयोगी क्षेत्रों को भी प्रोत्साहन देता है।
मौजूदा जीएसटी ढांचा और प्रस्तावित प्रभाव वर्तमान में:
कार्डबोर्ड, बॉक्स और कागज जैसे उत्पादों पर 12% जीएसटी लागू है (हाल में 18% से घटाया गया)।
स्टेशनरी जैसे उत्पाद (लिफाफे, डायरी, रजिस्टर आदि) 18% स्लैब में आते हैं।
आवश्यक मुद्रित सामग्री जैसे किताबें 0% या 5% की रियायती दर पर करयोग्य हैं।
प्रस्तावित ढांचे में 12% वाले अधिकांश उत्पादों को 5% में शामिल किया जा सकता है, लेकिन चिंता यह है कि कई सेवाएं 18% स्लैब में स्थानांतरित हो जाएंगी, जिससे उत्पादन लागत में 6% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
आगे की रणनीति
एआईएफपीपी इस संदर्भ में जीएसटी परिषद् और वित्त मंत्रालय को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपेगा। महासंघ का मानना है कि सरकार से सहयोगात्मक नीति मिलने पर यह क्षेत्र न केवल स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देगा, बल्कि निर्यात में भी बड़ा योगदान देगा।