उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति का एक महत्वपूर्ण दल, अपना दल (एस), अब अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल और संगठन प्रमुख आशीष पटेल के खिलाफ नाराजगी और आरोपों की लम्बी फेहरिस्त ने पार्टी की स्थिति को गंभीर कर दिया है। हाल के तीन वर्षों में, इस पार्टी के सात प्रमुख नेताओं ने या तो इस्तीफा दिया है या फिर पार्टी से निष्कासित कर दिए गए हैं। हर नेता ने एकजुट रहकर काम करने की बजाय इसे ‘एक परिवार की जागीर’ बताया है। हाल ही में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल ने भी इस्तीफा देकर इसे और अधिक प्रभावित किया। उन्होंने यह कहते हुए पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाए कि, “मैं रबर स्टैंप बनकर नहीं रह सकता।”
राजकुमार पाल के इस्तीफे के पीछे कई गंभीर मुद्दे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है, और नेतृत्व का रवैया तानाशाही का है। उनके अनुसार, यह पार्टी अब डॉ. अंबेडकर और डॉ. सोनेलाल पटेल के मूल्यों से भटक चुकी है। पार्टी में लोकतांत्रिक मूल्यों की कमी हो गई है और एकतरफा निर्णय लिए जा रहे हैं। राजकुमार का मानना है कि उन्हें एमएलसी का पद देने का आश्वासन दिया गया था, परंतु यह केवल एक वादा साबित हुआ। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने पैसे खर्च किए, लेकिन फिर भी कोई परिणाम नहीं मिला।
अपना दल का इतिहास 1995 में डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा स्थापित होने से शुरू होता है। इस पार्टी की नींव उस समय रखी गई थी जब डॉ. पटेल ने बहुजन समाज पार्टी के अंदर की राजनीति से असंतोष व्यक्त करते हुए एक अलग मंच की आवश्यकता महसूस की। सालों के संघर्ष के बाद, 2014 में बीजेपी के साथ गठबंधन ने इस पार्टी की किस्मत बदल दी। अनुप्रिया पटेल के नेतृत्व में पार्टी ने कई चुनावी सफलताएँ प्राप्त कीं, लेकिन यह सफलता लंबे समय तक नहीं चल सकी। शेयरिंग के चलते पार्टी दो भागों में विभाजित हो गई, जिसमें अनुप्रिया ने अपना दल (एस) और उनकी मां कृष्णा पटेल ने अपना दल (कमेरावादी) की स्थापना की।
हाल के घटनाक्रम और राजकुमार पाल द्वारा उठाए गए मुद्दों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों एक समय में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी अब इस प्रकार के अंतर्विरोधों में उलझ गई है। नेताओं की नाराजगी और पार्टी के अंदरखाने की राजनीति ने यह स्थिति उत्पन्न की है कि अब पार्टी के अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं। यदि सुधार की दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो यह संभावना प्रबल होती जा रही है कि अपना दल (एस) और भी बड़े संकट में फंस सकता है।
इस वक्त, पार्टी में हुई विद्रोह की घटनाओं ने संकेत दिया है कि कार्यकर्ताओं की आवाज़ पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। अगर अपना दल (एस) को पुनः मजबूत होना है, तो उसे अपने कार्यकर्ताओं की अहमियत समझनी होगी और नेतृत्व में बदलाव लाने की आवश्यकता है। वर्तमान में, पार्टी के भीतर हो रहे विद्रोह और नाराजगी के चलते यह साफ होता जा रहा है कि उसे एक नई दिशा और पुनर्गठन की जरुरत है, यह देखना होगा कि क्या वे इन आलसी प्रवृत्तियों को दूर करते हुए फिर से एकजुट होकर आगे बढ़ पाने में सफल होंगे।