56 की उम्र में मनोज बाजपेयी की शादी टूटी, तलाक के बाद सुसाइड की कोशिश? दोस्तों ने जान बचाई!

Share

बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के छोटे से गांव बेलवा से निकलकर देश की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में अपने आप को स्थापित करने की कहानी मनोज बाजपेयी की है। उनके जीवन की कहानी न केवल संघर्षों से भरी है, बल्कि अपेक्षाओं और सपनों की भी एक दिलचस्प यात्रा है। मनोज का जन्म 23 अप्रैल 1969 को हुआ और आज वह 56 वर्ष के हो गए हैं। अभिनेता बनने का सपना लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया, जहाँ उनकी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव शामिल रहे हैं।

मनोज के पिता राधाकांत खुद फिल्म अभिनेता बनना चाहते थे, लेकिन उन्हें पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला नहीं मिला। इसका असर मनोज पर पड़ा, जिन्होंने बचपन से ही अभिनय में रुचि विकसित की। 12वीं कक्षा के बाद, उन्होंने अपने पिता से छिपाकर दिल्ली जाने का फैसला किया। उन्होंने यह कहा कि वह आईएएस की तैयारी के लिए जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने अपने पिता को बाद में पत्र लिखकर स्पष्ट किया कि उनका सपना अभिनय का है। मनोज के पिता ने उनकी आर्थिक मदद भी की, जिससे उन्हें अपने सपने को आगे बढ़ाने का हौसला मिला।

दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में ऑडिशन के दौरान उन्हें तीन बार असफलता का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी रुचि और मेहनत ने उन्हें निराश नहीं किया। उन्होंने एक्ट वन थिएटर ग्रुप जॉइन किया, जहाँ उन्होंने नसीरुद्दीन शाह जैसे बड़े कलाकारों के समकक्ष अपनी पहचान बनानी शुरू की। उनका नाटक ‘नेटुआ’ बेहद सफल रहा, जिससे वह रंगमंच पर काफी मशहूर हो गए। वहीं, इसी ग्रुप में उनकी मुलाकात दिव्या नाम की एक लड़की से हुई। दोनों के बीच प्यार हुआ, लेकिन समाजिक स्थिति के कारण उनकी शादी को स्वीकृति नहीं मिली।

मनोज और दिव्या ने पुलिस सुरक्षा में मंदिर में शादी की, लेकिन शादी के कुछ ही महीनों में दोनों के बीच तलाक हो गया। इस विफलता ने मनोज को मानसिक रूप से तोड़ दिया और सुसाइड के ख्याल तक आए। हालाँकि, दोस्तों ने उन्हें संभाला और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद, मनोज ने मुंबई का रुख किया, जहाँ उनका संघर्ष जारी रहा।

उनके लिए शुरुआत आसान नहीं थी। फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ की शूटिंग के बाद भी उन्हें पहचान नहीं मिली। मुंबई में रहने के दौरान, मनोज के पास कई बार असफलता का सामना करना पड़ा और उन्हें काम खोजने में कठिनाई आई। हालाँकि, अंततः धारावाहिक ‘स्वाभिमान’ ने उन्हें पहचान दिलाई, जिसके बाद उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ आया। महेश भट्ट जैसे बड़े नामों ने उनके талेंट की सराहना की और उन्हें ‘सत्या’ जैसी फिल्मों में मौका दिया, जिसने उनकी किस्मत बदल दी।

मनोज के जीवन की कहानी न केवल संघर्ष और असफलता की है, बल्कि यह इस बात का भी उदाहरण है कि कैसे विश्वास और प्रतिबद्धता से किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। आज वह भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित और बहुआयामी अभिनेताओं में से एक हैं और भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।