हाल ही में अमेरिका से डिपोर्ट किए गए 104 भारतीय नागरिकों में अमृतसर के सलेमपुर गांव के निवासी दलेर सिंह भी शामिल हैं। वापस भारत आने के बाद, दलेर ने अपने खतरनाक अनुभव को साझा किया, जो अवैध प्रवास का अनावश्यक जोखिम दर्शाता है। उनका सफर 15 अगस्त 2024 को शुरू हुआ, जब उन्होंने एक एजेंट की मदद से अमेरिका जाने की योजना बनाई थी। एजेंट ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वह उन्हें एक सुरक्षित तरीके से अमेरिका पहुंचा देगा, लेकिन वास्तविकता कुछ और थी। शुरुआती योजना के अनुसार, उन्हें दुबई और फिर ब्राजील पहुंचाया गया, जहां उन्हें दो महीने तक असहाय स्थिति में रखा गया।
दलेर सिंह के अनुसार, ब्राजील में रुकने के दौरान एजेंटों ने उन्हें बताया कि वीजा प्राप्त करना संभव नहीं है, इसलिए उन्हें “डंकी रूट” का सहारा लेना पड़ेगा। यह सुनकर दलेर और उनके अन्य साथियों को कोई और विकल्प नहीं दिखाई दिया, और उन्होंने पनामा के खतरनाक जंगलों की ओर यात्रा शुरू की। यह जंगल 120 किलोमीटर लंबा है और इसे पार करने में उन्हें लगभग तीन दिन लगे। दलेर ने इस यात्रा को अत्यधिक खतरनाक बताते हुए कहा कि हर कदम पर जान का खतरा बना रहता था। उनके समूह में नेपाल के नागरिक और महिलाएं भी शामिल थीं, जिनके साथ एक गाइड उनकी सहायता के लिए था।
पनामा के जंगलों को पार करने के बाद, दलेर और उनके साथी मैक्सिको पहुंचे, जहां से उन्हें अमेरिका के तेजवाना बॉर्डर की ओर बढ़ना था। हालांकि, 15 जनवरी 2025 को अमेरिकी अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। दलेर ने बताया कि उनकी सभी उम्मीदें यहां खत्म हो गईं, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे सुरक्षित तरीके से अमेरिका पहुंचेंगे। इस खतरनाक सफर में उन्होंने लाखों रुपए खर्च किए, लेकिन अधिकांश पैसे एजेंटों ने धोके से ले लिए। उन्होंने बताया कि उन्हें दुबई और भारत के दो एजेंटों द्वारा ठगा गया।
अमेरिका में गिरफ्तारी के बाद दलेर सिंह और अन्य डिपोर्ट किए गए लोगों को एक कैंप में रखा गया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में जो भी प्रक्रियाएं अपनाई गईं, वे पूरी तरह से कानूनी थीं। वे आभारी हैं कि उन्हें अंततः घर वापस आने का मौका मिला। हालांकि, जब उन्हें विमान में बैठाया गया, तो वे नहीं जानते थे कि उन्हें भारत भेजा जा रहा है। गिरफ्तारी के दौरान उनके हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां थीं, और महिलाओं के साथ भी ऐसा ही व्यवहार किया गया, जबकि बच्चों और माइनर्स के साथ थोड़ी भिन्नता थी।
डिपोर्टेशन के दौरान दलेर ने कहा कि अमेरिका के अधिकारी नियमों के अनुसार काम कर रहे थे और किसी प्रकार का दुर्व्यवहार नहीं किया गया। यद्यपि वे तनावपूर्ण स्थिति में थे, फिर भी उनके साथ इंसानियत का व्यवहार होता रहा। आज दलेर सिंह की यह कहानी उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो अवैध प्रवासन के खतरनाक रास्तों पर चलने का विकल्प चुनते हैं।