फिल्मों की कमाई का रहस्य: शाहरुख-सलमान देते हैं डिस्ट्रीब्यूटर को सहारा, मनोज कुमार ने बेचा बंगला!

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फिल्म उद्योग में हाल के वर्षों में कई बड़े बदलाव आए हैं। पहले, फ़िल्मों की कमाई मुख्यतः थिएटर रिलीज, म्यूजिक और सैटेलाइट राइट्स पर निर्भर होती थी। अब, ओटीटी प्लेटफार्मों ने इस पारंपरिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। डिजिटल राइट्स ने न केवल दर्शकों की फ़िल्म देखने की आदतों में बदलाव किया है, बल्कि थिएटर व्यवसाय को भी नई चुनौतियों से जूझने पर मजबूर किया है। इसलिए, सवाल उठता है कि क्या ओटीटी ने फिल्म उद्योग में नए अवसर प्रदान किए हैं या इसे नुकसान पहुँचाया है? इस विषय पर चर्चा करने के लिए, हमने फिल्ममेकर प्रांजल खंधाड़िया, शब्बीर बॉक्सवाला और फिल्म एनालिस्ट-डिस्ट्रीब्यूटर राज बंसल से बातचीत की।

कोरोना महामारी के दौरान, जब थिएटर बंद थे, दर्शकों को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर बिना किसी खर्च के फ़िल्में देखने का मौका मिला। इससे दर्शकों की आदतों में बदलाव आया, और वे धीरे-धीरे ओटीटी के प्रति आकर्षित हुए। जहां एक फिल्म देखने के लिए थिएटर में 600 रुपए का टिकट और अन्य खर्च मिलाकर लगभग 3000-3500 रुपए लगते हैं, वहीं ओटीटी प्लेटफार्मों पर यह खर्च सीधा 15 से 2000 रुपए सालाना हो जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दर्शकों का ध्यान अब अधिकतर ओटीटी की ओर है।

इस बीच, साउथ इंडियन फिल्म इंडस्ट्री ने हिंदी सिनेमा की चुनौतियों का सामना करते हुए उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। साउथ की फिल्मों की सफलता के पीछे उनकी बेहतरीन कहानियाँ, संगीत, और निर्माण की गुणवत्ताएँ हैं। साथ ही, वहां की टिकट की कीमतें भी बहुत सामान्य होती हैं। बड़े सितारे जैसे एनटीआर, रजनीकांत, और महेश बाबू के फैंस भी इन फिल्मों की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके विपरीत, हिंदी सिनेमा में स्टूडियो सिस्टम के आगमन ने कई प्रोड्यूसर्स को अपनी फिल्मों की गुणवत्ता से ध्यान हटाने पर मजबूर कर दिया है, जिससे कई अनुभवी निर्देशक बिना काम के रह गए हैं।

डिस्ट्रिब्यूटर्स और एक्जीबिटर्स का भी फिल्म व्यवसाय में महत्वपूर्ण योगदान होता है। पहले हर क्षेत्र में 50 से 100 डिस्ट्रीब्यूटर्स होते थे, लेकिन अब ये संख्या घटकर बहुत कम रह गई है। इससे अधिकतम फ़िल्मों का वितरण सीमित डिस्ट्रीब्यूटर्स के हाथों में आ गया है। फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन के अनुसार ही म्यूजिक और सैटेलाइट राइट्स की कीमत तय करने की नई रणनीति अपना ली गई है। इस कड़ी में, प्रोड्यूसर्स को अब यह समझने की आवश्यकता है कि केवल थिएटर कलेक्शन पर निर्भर रहना सही नहीं है; उन्हें एक मल्टी-स्टेज रेवेन्यू प्लान बनाना अनिवार्य है।

फिल्म उद्योग को आने वाले समय में एक नई दृष्टि अपनानी होगी। अब सिर्फ एक बार का निवेश नहीं, बल्कि एक हाइब्रिड रिलीज मॉडल अपनाते हुए डिजिटल, सैटेलाइट, म्यूजिक, और री-रिलीज जैसे सभी मॉडलों को ध्यान में रखते हुए योजना बनानी होगी। पुरानी हिट फिल्मों की मांग बढ़ रही है, और ऐसी फिल्मों को फिर से दर्शकों के बीच लाना भी एक सही रणनीति हो सकती है। इस सारे परिदृश्य में, मीडिया व दर्शकों के प्रवृत्तियों का सही अनुमान लगा पाना आवश्यक होगा, जिससे फिल्म निर्माता दर्शकों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

इस प्रकार, हम कह सकते हैं कि इंडस्ट्री में बहुत व्यापक बदलाव देखने को मिल रहे हैं, और सही रणनीति अपनाकर ही प्रोड्यूसर्स और निर्देशकों को इस नई युग में अपने आप को स्थापित करना होगा।