अन्न-जल की शुद्धि की गारण्टी दे सरकार :  अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती

Share

अन्न-जल की शुद्धि की गारण्टी दे सरकार :  अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती

महाकुंभ नगर , 24 जनवरी (हि.स.)।तैत्तिरीयोपनिषद् में “अन्नं ब्रह्मेति व्यजनात” वाक्य कहकर सनातन वैदिक हिन्दू आर्य परमधर्म में अन्न को देवता अथवा भगवान् ही नहीं, अपितु ब्रह्म के रूप में स्वीकार कर अन्न की आराधना करने का उपदेश किया गया है। इस अन्न के उत्पादन और खाए गये अन्न को पचाने के लिए जल की भी अपरिहार्य भूमिका है। यादृशं भक्षयेदन्नं तादृशी जायते मतिः। दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।। जैसा अन्न खाते हैं वैसी ही शुद्धि होती है। दीपक अन्धकार का भक्षण करता है। अतः काजल उगलता है। लोक में भी “जैसा खाएं अन्न वैसा हो तन-मन” कहा जाता है। इस आलोक में हर सनातनी को अन्न-जल का न केवल सम्मान करना चाहिए अपितु शुद्ध अन्न-जल का आग्रह रखना चाहिए। भारत की सरकार का यह कर्तव्य है कि अपनी हर गारण्टी से पहले वह देश के नागरिकों को खाने के लिए शुद्ध अन्न और पीने के लिए शुद्ध जल की गारण्टी दे।

उक्त बातें ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शङ्कराचार्य स्वामिश अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने शुक्रवार को पपपपअन्न-जल की शुद्धि विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कही।

उन्होंने कहा कि देश के किसानों से भी हम कहना चाहेंगे कि वे हम सनातन धर्मानुयायियों के उपयोग के लिए “धर्मान्न” का उत्पादन आरम्भ करें और इसके लिए धर्मान्न उत्पादक कम्पनी बनाकर परमधर्मसंसद् १००८ द्वारा बताई गई विधि से धर्मान्न उगाएं और उसे अपनी स्वयं की निर्धारित कीमत पर हम परमधार्मिकों को उपलब्ध कराएं। हमारा मानना है कि अन्न देवता हैं और किसान उसका आवाहक पुजारी। इन्हीं किसान पुजारी के माध्यम से हम अन्न देवता का आराधन कर सकते हैं।