**लुधियाना में गुरु रामदास जी के 450वें प्रकाश पर्व का धूमधाम से आयोजन**
लुधियाना: सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास जी के 450वें प्रकाश पर्व का उल्लास देखने को मिला। इस अवसर पर शहर के सभी प्रमुख गुरुद्वारों में विशेष समागम आयोजित किए गए। शहरवासी सुबह से ही उपासना में जुट गए, जहां संगत ने गुरबाणी का जाप किया। श्री दरबार साहिब से आए हजूरी रागी जत्थों ने कीर्तन करके संगत को भक्ति के रंग में रंग दिया। इस विशेष अवसर पर गुरुद्वारा सिंह सभा मॉडल टाउन, गुरुद्वारा सिंह सभा सराभा नगर तथा अन्य प्रमुख गुरुद्वारों में धार्मिक पाठों का आयोजन किया गया।
समागम में श्री जपजी साहिब, श्री जाप साहिब, श्री चौपाई साहिब, श्री आनंद साहिब और श्री सुखमणि साहिब का सामूहिक पाठ किया गया। यह पुनीत अवसर भक्तों को गुरु रामदास जी की शिक्षाओं और उनके जीवन के महान कार्यों के बारे में जानने का एक अवसर प्रदान करता है। रागी जत्थों द्वारा ‘धन-धन रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सांवरिया पूरी होइ’ जैसे भजनों का उद्बोधन किया गया, जिसने वातावरण को भक्ति के अद्वितीय अनुभव से भर दिया।
गुरु रामदास जी की शिक्षाओं को रागी भाई किरपाल सिंह, भाई सुखबीर सिंह, भाई दिलबाग सिंह और अन्य ने भक्तों के समक्ष रखा। उन्होंने बताया कि गुरु रामदास जी ने आनंद कारज के लिए चार लावों की रचना की थी, जिससे विवाह संबंधी रीति-रिवाजों में सरलता आई। उनके योगदान से सिख समाज में शादी के इस नए तरीके को मान्यता मिली। इसके साथ ही, सम्राट अशोक ने गुरु रामदास जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर पंजाब की प्रजा का एक साल का लगान माफ करने का निर्णय लिया, जो उस समय की एक महत्वपूर्ण घटना थी।
गुरु रामदास जी के समय में ही अमृतसर में श्री दरबार साहिब का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था, जिससे न केवल सिखों बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना। समागम में शामिल सभी भक्तों ने गुरु रामदास जी की महानता का गुणगान किया और उनकी शिक्षाओं का अनुकरण करने का संकल्प लिया।
इस भव्य आयोजन ने सिख समुदाय में एकता और समर्पण की भावना का पुनर्नवा किया और सभी ने मिलकर गुरु रामदास जी के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सिख इतिहास और संस्कृति की धरोहर को सहेजने का एक प्रयास भी है। योग, शांति और ध्यान के साधनों के माध्यम से गुरु रामदास जी के आदर्शों को जीवित रखना हर सिख का कर्तव्य है।