पंजाब के कपूरथला जिले की सुलतानपुर लोधी से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां सैकड़ों किसानों ने रेलवे ट्रैक पर धरना प्रदर्शन करते हुए अपनी नाराजगी व्यक्त की है। किसानों का मुख्य आरोप है कि उनकी धान की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर नहीं खरीदी जा रही है और इस कारण उन्हें बड़ी कटौती का सामना करना पड़ रहा है। यह धरना किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के जिला अध्यक्ष सरवन सिंह बाबूपुर के नेतृत्व में शुरू किया गया है। किसानों ने सोमनाथ एक्सप्रेस को स्टेशन पर ही रोकने का कदम उठाया है और इस दौरान उन्हें सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करते हुए देखा गया।
धरना स्थल पर उपस्थित किसानों ने कहा कि धान की फसल सीजन के दौरान वे मंडियों में अपना उत्पादन लेकर जा रहे हैं, लेकिन वहां उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। मार्केट में फसल के ढेर लगे हुए हैं, जिससे किसानों की स्थिति दयनीय हो गई है।सरवन सिंह बाबूपुर ने बताया कि सरकार द्वारा निर्धारित धान की दर से कम पर फसल का खरीदार मिल रहा है, जिसके कारण किसान और मजदूर दोनों ही आर्थिक रूप से परेशान हैं। उनके अनुसार, न तो राज्य सरकार इस समस्या के प्रति गंभीर है और न ही केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है। किसानों की मुख्य मांग यह है कि उनकी फसल को एमएसपी पर खरीदा जाए ताकि उन्हें उचित मूल्य मिल सके।
प्रदर्शन के दौरान कई प्रमुख किसान नेता भी उपस्थित रहे, जिसमें शेर सिंह महिवाल, भजन सिंह खिजरपुर, मलकीत सिंह और अन्य शामिल हैं। ये सभी किसान एकजुट होकर अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं, ताकि उनकी समस्याओं का समाधान हो सके। धरने में आए किसानों ने यह स्पष्ट किया कि वे तब तक अपना प्रदर्शन जारी रखेंगे जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं।
यह आंदोलन एक बार फिर दिखाता है कि किसानों को अपने हक के लिए जागरूक होना बहुत जरूरी है। किसान मजदूर संघर्ष समिति ने सभी किसानों से अपील की है कि वे इस मुद्दे को लेकर संगठित रहें और अपनी आवाज उठाते रहें। उनके अनुसार, जब तक सभी किसान मिलकर अपनी बात नहीं कहेंगे, तब तक उनकी समस्याएँ हल नहीं होंगी।
इस घटना से स्पष्ट है कि पंजाब में किसान आंदोलन का एक नया दौर शुरू हो गया है। ऐसे में यह देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर कितनी गंभीर कार्रवाई करती है और किसानों की मांगों को सुनने के लिए क्या कदम उठाती है। किसानों का यह धरना केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में किसानों की दुर्दशा का प्रतीक बन चुका है, जिससे कृषि क्षेत्र में जरूरी सुधार की आवश्यकता का एहसास होता है।