बांग्लादेश के गृह सलाहकार के बयान का मंतव्य!
डॉ. प्रभात ओझा
बांग्लादेश के ताजा हालात और वहां भारत के प्रति रुख को समझने के लिए दो ताजा बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए। पहला बिंदु यह है कि वहां बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के चिह्न मिटाने की कोशिश हुई है। खासकर 1971 के युद्ध के बाद भारतीय जनरल के सामने पाकिस्तानी सेना के सरेंडर दिखाने वाली मूर्तियां तोड़ दी गई हैं। दूसरा बिंदु बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में होम अफेयर्स एडवाइजर एम सखावत हुसैन का बयान है। भारत के एक अखबार से बात करते हुए हुसैन ने भारत को सलाह दी है कि वह बांग्लादेश की मदद करे, अन्यथा उसके मामले से दूर ही रहे। इन दो बिंदुओं में पहले को प्रथम दृष्ट्या कुछ प्रदर्शनकारियों का रुख कहा जा सकता है।
इसमें एक देश की आजादी के चिह्न मिटा देने के भाव के साथ भारत के प्रति रुख बदलने की साजिश भी शामिल है। उधर, हुसैन का बयान भारत के प्रति देश की नई सरकारी नीति को दर्शाता है। वे होम अफेयर्स एडवाइजर हैं, जो अंतरिम सरकार में गृहमंत्री की हैसियत रखता है। उनका बयान बांग्लादेश का उस भारत के प्रति रुख है, जिसने बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में मदद की थी। भारत के प्रति बांग्लादेश का यह रुख उस समय भी नहीं था, जब नया देश बनने के चार साल के अंदर ही वहां के राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या कर तख्ता पलट किया गया था। यानी जो बांग्लादेश की उदय का हीरो था, उसकी हत्या तो की कई किंतु बांग्लादेश मुक्ति में सहायक भारत के प्रति बेरुखी इतनी अधिक नहीं हो सकी थी। ऐसे में विचारणीय है कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, उसमें भारत के प्रति नफरत एक साजिश के तहत पैदा की जा रही है।
भारत के प्रति नाराजगी आम लोगों में नहीं है। इसे उस तथ्य से समझा जा सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जो इस्तीफे के बाद भारत आ गई हैं, उनकी वापसी के लिए भी बांग्लादेश में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं। इस तरह का एक प्रदर्शन वहां के गोपालगंज जिले में हुआ। वहां प्रदर्शनकारियों ने सेना के एक वाहन को आग लगा दी। सैनिकों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प में 15 लोगों के घायल होने की भी खबर है। गोपालगंज कैंप के लेफ्टिनेंट कर्नल मकसूदुर रहमान ने इस घटना की पुष्टि की। फिर अवामी लीग के कार्यकर्ता गोपालगंज के टुंगीपारा में शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान के मकबरे पर भी एकत्रित हुए। वहां उन्होंने अपनी नेता शेख हसीना को वापस लाने की कसमें खाईं। इस तरह के तथ्य बताते हैं कि बांग्लादेश के आम लोग शेख हसीना के विरुद्ध नहीं हैं। इस सच्चाई के बावजूद कि आरक्षण विरोधी आंदोलन सरकार के खिलाफ पहुंचा, किंतु यह भी तय है कि उसके बाद शेख हसीना को सरकार से और देश से बाहर निकालने की साजिश अन्य शक्तियों के इशारे पर ही की गई।
चूंकि शेख हसीना अपने प्रधानमंत्री वाले कार्यकाल के दौरान सदैव भारत समर्थक रही हैं, इसलिए पाकिस्तान सहित कई शक्तियां अब बांग्लादेश से भारत को अलग करने की साजिशें करेंगी।
इसका संकेत होम अफेयर्स एडवाइजर सखावत हुसैन के बयान में मिलता है। हुसैन दावा करते हैं कि उनके यहां हुए बदलाव के पीछे किसी और देश अथवा एजेंसी का हाथ नहीं है। यहां ध्यान देना होगा कि इसी तरह के बयान पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मरियम जहरा बलूच ने भी दिए हैं। उन्होंने तो परोक्ष रूप से इस मामले में भारत पर अलग तरह के आरोप जड़ दिए। बलूच ने कहा, “पाकिस्तान ऐसे सारे बयानों को खारिज करता है। ऐसे बयान पाकिस्तान के प्रति भारत के परेशान करने वाले जुनून को दर्शाते हैं।” बलूच ने यह भी जोड़ा, “भारतीय राजनीतिक नेताओं और उनके मीडिया को घरेलू और विदेश नीति में अपनी विफलताओं के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराने की आदत है।” इस तरह के बयान स्पष्ट करते हैं कि बांग्लादेश के बदलाव और भारत से रिश्ते पर न सिर्फ वहां की आंतरिक शक्तियां, बल्कि पाकिस्तान भी रुचि ले रहा है। रुचि अमेरिका और चीन की भी है, जो बांग्लादेश के उस सेंट मार्टिन द्वीप पर नजरें लगाए बैठे हैं, जो सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहां से जलमार्ग के जरिए कहीं भी पहुंचा जा सकता है।
(लेखक, स्वंत्र पत्रकार हैं।)