08HREG407 पहले नदी अगम्य व अगोचर थी, अब गम्य व गोचर हो गई : डॉ रमाशंकर सिंह
– पानी सरलता, समता और समरसता का प्रतीक : डॉ अमृता
– इविवि में तीन दिवसीय कार्यशाला
प्रयागराज, 08 सितम्बर (हि.स.)। पहले नदी मनुष्य के लिए अगम्य और अगोचर थी लेकिन वर्तमान में नई-नई टेक्नोलॉजी के आने से अब नदियां गम्य और गोचर हो गई हैं। आज नदियों का वास्तविक स्वरूप बदल गया है लेकिन जब यह नदियां अपने वास्तविक स्वरूप में आती हैं तो कहा जाता है कि नदियों ने विकराल रूप धारण कर लिया है और तबाही मचा रही हैं जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
यह बातें डॉ रमाशंकर सिंह ने “नदी, तट और बालू : गांधीवादी विकास की संभावनाएं“ विषय पर कही। वह इविवि के गांधी विचार एवं शांति अध्ययन संस्थान की तीन दिवसीय कार्यशाला में आयोजन के अंतर्गत ऑनलाइन व्याख्यान में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि 19वीं शताब्दी के बाद मनुष्यों ने ही नदियों पर कहर ढाना शुरू किया। नदी के तट पर मनुष्य सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक क्रिया कलापों और मानवीय हस्तक्षेपों द्वारा नदियां कराह रही हैं। आज नदी के तट पर उपस्थित संसाधनों की लूट-खसोट मची हुई है। इससे नदियों के वास्तविक स्वरूप में बदलाव आया है। नदी की जल संरचना बिगड़ती गई। इससे अनेक जलीय जीव विलुप्त होते या कम होते जा रहे हैं। ज्यादा मानवीय हस्तक्षेपों और नदियों से अधिक से अधिक बालू खनन से धसान की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
उन्होंने आगे कहा कि आज नदियों के किनारे रिवरफ्रंट बनाए जाने शुरू हो गए हैं। इससे स्थानीय लोगों का प्रभाव खत्म हो जाएगा। नदियों को अक्षुण्य रूप से बहने दिया जाए, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है। आज मानवता के पक्ष में विकास हो रहा है जो कि वास्तव में ऐसा नहीं है। भारत में नदियों को गुलाम बनाया गया। जो लोग नदियों पर पूरी तरह निर्भर थे उनको बाहर या टेक्नोसाइड कर दिया गया। जो नदी देश के बड़े हिस्से के लोगों का पेट भरती थी, आज उनको ही दरकिनार कर दिया गया है।
दूसरे सत्र में “जल संरक्षण की देशज परंपराएं“ विषय पर इविवि मानवशास्त्र विभाग के डॉ. राहुल पटेल ने कहा कि जो कुछ हम अपने जीवन में ढाल लेते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करते हैं, वही परंपरा कहलाती है। नीलगिरी में कुछ विशेष जनजातियां कुआं बनाने के लिए ताड़ के पेड़ को खोखला कर जमीन में गाड़कर जल संरक्षित करते हैं। उन्होंने “तालाब की कथा-व्यथा“ गांव के तालाब की कहानी कही जिसमें एक तालाब की जीवंत एवं मानवीय संवेदनाओं से युक्त मार्मिक अभिव्यक्ति की गई।
तीसरे सत्र में शोधार्थियों ने कविता पाठ किया। इसमें “पानी“ पर आधारित अनेक कविताएं, नज़्म और गजलों की प्रस्तुति हुई। उसके बाद इविवि की हिन्दी सहायक आचार्या डॉ अमृता ने पानी के महत्व, उसके संकट और उसके बहुआयामी अर्थ तथा सार्थकता पर प्रकाश डाला। चौथे सत्र में पोस्टर निर्माण और तात्कालिक भाषण में अनेक शोधार्थियों ने हिस्सा लिया। पोस्टर निर्माण का विषय “बिन पानी सब सून“ रहा।
संस्थान के निदेशक प्रो. संतोष भदौरिया ने कुछ कहानियों का जिक्र किया जिसमें बुड़ान, पानी आदि का उल्लेख करते हुए पानी की स्थिति और उसकी यात्रा पर अपनी बात रखी। भाषण प्रतियोगिता में शोधार्थियों ने अनेक पर्यावरणिक और जलसंरक्षण से जुड़े मुद्दों पर अपनी बातें रखीं। इस दौरान डॉ. प्रमोद ने “वाटर लिट्रेसी“ कार्यक्रम का भी जिक्र किया। संचालन डॉ. तोषी आनंद एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुरेंद्र कुमार ने किया। ऑनलाइन व्याख्यान का संचालन हरिओम कुमार ने किया।