09HREG429 परिजन आत्महत्या न करें इसमें परिवार की है महत्वपूर्ण भूमिका
—विश्व आत्महत्या निवारण दिवस (10 सितम्बर) पर विशेष
वाराणसी, 09 सितम्बर (हि.स.)। परिजन अवसाद में या किसी अन्य कारणों से आत्महत्या न करने पाये इसमें परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है। अपनों से संवाद, आत्महत्या का विचार आने पर मनोवैज्ञानिक से परामर्श भी लेना आवश्यक है। विश्व आत्महत्या निवारण दिवस की पूर्व संध्या पर शनिवार को एआरटी सेंटर, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ मनोज कुमार तिवारी ने बताया कि दुनिया में आत्महत्या दर दिनों दिन बढ़ती जा रही है। दुनिया में हर 40 सेकेंड पर एक व्यक्ति आत्महत्या कर रहा है। इस वर्ष 21वां विश्व आत्महत्या निवारण दिवस रविवार 10 सितम्बर को मनाया जायेगा।
इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विश्व आत्महत्या निवारण दिवस के लिए नारा दिया है- कार्यवाही के द्वारा आशा जगाना। डॉ तिवारी बताते है कि आत्महत्या ऐसा व्यवहार है जिसमें प्राणी स्वयं का जीवन समाप्त कर लेता है। पहले व्यक्ति में बार-बार आत्महत्या के विचार आते हैं फिर वह आत्महत्या का प्रयास करता है, आत्महत्या के सभी प्रयास सफल नहीं होतें हैं, 25 व्यक्तियों द्यारा आत्महत्या का प्रयास करने पर उनमें से एक व्यक्ति की मौत होती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं में आत्महत्या के विचार अधिक पाया जाता हैं । किंतु एक महिला के सापेक्ष तीन पुरुष आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या करने वाले व्यक्तियों के संख्या के आधार पर विश्व में भारत का 43वां स्थान है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विगत वर्ष में लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु आत्महत्या के कारण हुई है। लैंसेट पत्रिका के अनुसार विश्व की कुल 18 फीसद महिलाएं भारत में रहती हैं । जबकि विश्व में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले कुल आत्महत्या में भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी 36 फीसद है। ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज के अनुसार भारत में हर 4 मिनट में एक आत्महत्या होती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार छात्रों में प्रतिवर्ष आत्महत्या की दर में वृद्धि हो रही है। 2020 में लगभग 12526 छात्रों ने आत्महत्या किया था । वहीं, 2021 में 13089 छात्रों ने आत्महत्या किया। 15 – 24 वर्ष के लोगों के मृत्यु का आत्महत्या दूसरा सबसे बड़ा कारण है। 81 फीसद लोग आत्महत्या करने से पूर्व इसका संकेत अवश्य देते हैं। किसी से इसके बारे में चर्चा करते हैं या लिखते हैं।
—आत्महत्या का विचार ऐसे रखते हैं
मेरे मरने के बाद क्या आपको दुख होगा ?, क्या मेरे बिना आप जी लेंगे ?, अब मुझे जीने का इच्छा नहीं है, मुझे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। आत्महत्या के कारणों में आर्थिक तनाव, सामाजिक अलगाव की स्थिति ,प्रियजनों से मुलाकात न होना,नौकरी छूट जाना,सामाजिक क्रियाकलापों में शामिल न होना,धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता न करना, घरेलू कलह,अनिश्चितता एवं भय का माहौल ,मानसिक विकार, भावनाओं पर नियंत्रण न रख पाना, समायोजन कौशल की कमी, आनुवंशिकता,साजिश करके आत्महत्या के लिए वातावरण तैयार किया जाना, आत्महत्या के संसाधनों की आसान उपलब्धता है।
आत्महत्या का विचार रखने वाले व्यक्तियों के लक्षण
बार-बार मरने की इच्छा व्यक्त करना, निराशावादी सोच प्रकट करना कहना कि मैं जी कर क्या करूंगा, मेरे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। उच्च स्तर का दोष भाव,असहाय महसूस करना, अपने को मूल्यहीन समझना,जोखिमपूर्ण व्यवहार करना,अचानक से व्यवहार एवं दिनचर्या में परिवर्तन, नशे का अधिक उपयोग करना,अपने पसंदीदा कार्यों में भी अरुचि दिखाना,परिवार व मित्रों से दूरी बना लेना, स्वयं को समाप्त करने का अवसर एवं साधन तलाश करना।
डॉ तिवारी बताते है आत्महत्या निवारण में समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता अत्यंत आवश्यक है। परिवार के सदस्यों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि 40 फीसद लोग पारिवारिक स्थितियों के कारण आत्महत्या के लिए बाध्य होते हैं। प्रारंभिक शिक्षा से ही बच्चों को जीवन में संघर्ष की महत्ता की जानकारी प्रदान की जानी चाहिए । उन्हें बताया जाना चाहिए कि जीवन में यदि कोई समस्या है तो उसका समाधान किया जा सकता है। सरकार को चाहिए कि शारीरिक स्वास्थ्य देखभाल तंत्र के समान ही लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के देखभाल के लिए भी ग्रामीण स्तर पर भी मजबूत मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तंत्र तैयार करें। ताकि समय रहते बहुमूल्य जीवन को बचाया जा सके।