न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान : न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल

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15HREG454 न्याय में देरी, न्याय न मिलने के समान : न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल

-पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम

—पारिवारिक विवादों का जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है : न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर

वाराणसी,15 जुलाई (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर के मार्गदर्शन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय समिति के तत्वावधान में शनिवार से पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए मध्यस्थता तकनीकों पर आधारित दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ। सर्किट हाउस सभागार में पहले दिन उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल की अध्यक्षता में ‘पारिवारिक न्यायालय मामलों का संवेदीकरण’, मध्यस्थता पर प्रशिक्षण कार्यक्रम का फोकस रहा।

‘पारिवारिक न्यायालय मामलों के संवेदीकरण’ समिति के सदस्य न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर और वाराणसी के प्रशासनिक न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने उद्घाटन सत्र में अपनी बात रखी और विवादों को मध्यस्थता के माध्यम से निपटाने के लिए मध्यस्थता की तकनीकों पर चर्चा की। कार्यक्रम का उद्घाटन न्यायमूर्ति अजय भनोट, न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर और न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर किया। इस दौरान जिला न्यायाधीश, वाराणसी डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि “समय पर न्याय प्राप्त करने में कठिनाई के कारण, वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रियाएं जैसे बातचीत, मध्यस्थता, पंच निर्णय और सुलह तेजी के कारण पक्ष में बढ़ी हैं। जिससे वे मुद्दों का निपटारा करते हैं। ये मंच पार्टियों को मुकदमेबाजी का सहारा लिए बिना समाधान खोजने का अवसर प्रदान करते हैं, उन्हें शाब्दिक रूप से “अदालत कक्ष के बाहर” रखते हैं। कई तलाकशुदा जोड़े पाते हैं कि मध्यस्थता उन्हें मुकदमेबाजी तलाक की उच्च वित्तीय और भावनात्मक लागतों से बचने की अनुमति देती है।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि पारिवारिक विवादों का व्यक्तियों और उनके प्रियजनों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वे परिवारों के सामंजस्य और स्थिरता को चुनौती देते हुए हमारे समाज के मूल को छूते हैं। न्यायाधीशों के रूप में, यह हमारा कर्तव्य है कि हम एक ऐसा मंच प्रदान करें जहां परिवारों को सांत्वना, समझ और समाधान मिल सके। पारंपरिक प्रतिकूल अदालती कार्यवाही, हालांकि कुछ मामलों में आवश्यक है, हमेशा सौहार्दपूर्ण समाधान को बढ़ावा देने और पारिवारिक रिश्तों को संरक्षित करने के लिए अनुकूल नहीं होती है। न्यायमूर्ति अजय भनोट ने प्रतिभागियों को उपयोगी प्रशिक्षण सत्र के लिए शुभकामनाएं दीं और उन्होंने प्रार्थना की कि इस प्रशिक्षण के बाद फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश बेहतर इंसान और बेहतर न्यायाधीश बनकर सामने आएंगे।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में आज़मगढ़, बलिया, भदोही के ज्ञानपुर, चंदौली, देवरिया, ग़ाज़ीपुर, जौनपुर, मऊ, मिर्ज़ापुर, प्रतापगढ़, सोनभद्र और वाराणसी के पारिवारिक न्यायालय के न्यायाधीश भागीदारी कर रहे है।

दूसरे दिन प्रशिक्षण अनूप कुमार श्रीवास्तव, नीरज उपाध्याय, राजलक्ष्मी सिन्हा और संदीप सक्सेना, विशेषज्ञ मध्यस्थता प्रशिक्षक, मध्यस्थता और सुलह परियोजना समिति, सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया जायेगा।