07HRTL4 फ्रांस जल रहा है, क्योंकि उसने मुसलमानों को शरण दी!
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
किसी विचार, दृष्टि, मत, पंथ के लिए इस तरह की टिप्पणी करना प्रथम दृष्टया अजीब लग सकता है। कोई यह सोच सकता है कि यह बात किसी मजहब से जोड़कर कैसे कही जा सकती है ? किंतु फ्रांस में इस समय जो घट रहा है उसे देखकर इस्लाम और शरणार्थियों को लेकर यही दिख रहा है कि इस्लाम और उसको मानने वाले मुसलमान जिस भी देश में गए, वह वहां एक समय के बाद विध्वंस का कारण बने हैं। फिर भले ही दुनिया में यह कहने वालों की कोई कमी न हो कि इस्लाम प्रेम, भाईचारा और शांति का मजहब है!
अब आप फ्रांस में जो पिछले कुछ दिनों में घटा है उसका रिकॉर्ड देखिए, इन्होंने यहां अशांति की एक वैश्विक मिसाल कायम की है। संभवत 2023 का यह सबसे बड़ा आतंक है, जिसने छोटे से समय में कई हजार करोड़ रुपयों का नुकसान ही नहीं किया बल्कि वह बहुत कुछ मिटा दिया जिसको संजोने में हजारों सालों में अनगिनत लोगों की कड़ी मेहनत और संपूर्ण पुरुषार्थ लगा था । लाइब्रेरी को जलाना कोई सामान्य घटना नहीं है । पुस्तकालय को नष्ट कर देना यानी कि उन तमाम दस्तावेजों, ऐतिहासिक प्रमाणों और स्मृतियों को भी नष्ट कर देना है जिसके कारण फ्रांस में लोकतांत्रिक मूल्य, समृद्धि और संस्कृति जीवित हैं।
यह गहराई से सोचने वाली बात है कि जो फ्रांस लोकतंत्र का मसीहा बनकर इन शरणार्थियों की मदद के लिए आगे आया, वहां इन इस्लामिक कट्टरवादी मुसलमानों ने क्या किया ? इसका उत्तर मिलेगा कि अभी तक इन्होंने 23 हजार जगहों पर आग लगा दी । सुरक्षा बलों की 273 इमारतों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। 300 से अधिक पुलिस अधिकारी और 500 के करीब पुलिसवालों की इन्होंने घेर कर पिटाई की। ट्रेन, बस, कार सैंकड़ों की संख्या में फूंक दीं । 168 स्कूल और 105 मेयर कार्यालयों को एक के बाद एक अपना निशाना बनाया है । वस्तुत: पुलिस की गोली से मारे गए 17 साल के युवक नाहेल एम की मौत संपूर्ण फ्रांस के लिए इतनी भारी पड़ेगी, यह स्वप्न में भी यहां का कोई देश भक्त नहीं सोच सकता था।
देखा जाए तो इस्लामिक इतिहास ही कुछ ऐसा है कि जहां भी यह गया, वहां एक समय के बाद और कई बार वहां इसके पहुंचते ही मूल निवासियों के साथ युद्ध के हालात बन गए। यह भी एक एतिहासिक सत्य है कि पिछले कई वर्षों से फ्रांस समेत यूरोप के कई देशों ने दोनों बाहें फैलाकर रिफ्यूजियों का अपने घर में स्वागत किया और उसका परीणाम यह निकला है कि आज फ्रांस जल रहा है। सदियों पुरानी लाइब्रेरी को नालंदा विश्वविद्यालय की तरह जला दिया गया। ट्रेन और बसों को बीच रास्ते में रोक कर आग लगा दी गई। सबसे बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स एवं अन्य शॉपिंग कॉम्प्लेक्स को लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया गया । पुरुष तो पुरुष मुस्लिम महिलाएं भी इसमें बराबरी का साथ देती हैं। बुर्का पहने कई महिलाओं की वीडियो सामान लूटते हुए वायरल हैं।
वास्तव में मार्सेली का पुस्तकालय जला देना कोई सामन्य घटना नहीं है। जो ज्ञान की साधना करते हैं, उनसे पूछिए; एक किताब का मूल्य क्या होता है। आज से 830 वर्ष पहले सन् 1193 में इस्लामी आक्रांता बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह करते हुए उसके नौ मंजिला पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था। वहां दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों समेत लाखों पुस्तकें थीं जो महीनों तक जलती रहीं। यानी कि इससे यह भी सिद्ध होता है कि इन इस्लामिक कट्टरवादियों का कला, संस्कृति, भाषा, भाव, विचार, मत, चिंतन-मनन से कोई लेना-देना नहीं है।
फ्रांस में दंगाइयों का जो मनोबल देखने को मिल रहा है, वह यह भी बता रहा है कि जो कुछ भी यहां घट रहा है वह मुस्लिम तुष्टीकरण का परिणाम है। इसी एक बड़े कारण से आज फ्रांस जल रहा है, वहां दंगे भड़के हुए हैं। दुखद है कि 45 हजार पुलिस वालों की नियुक्ति के बाद भी अराजकता समाप्त नहीं हो रही। मीडिया में ”अल्लाह हू अकबर” का इस्लामिक भीड़ के साथ नारा लगाते हुए एक वीडियो वायरल है, उसमें वह शख़्स यह कहते हुए सुना जा सकता है, ”अगर पुलिस हमें मारती है तो हमें भी हत्या करने का, पुलिस को मारने का अधिकार है। कुरान में लिखा है कुछ ही सालों में फ्रांस यूरोप का पहला इस्लामिक देश होगा।” अर्थात यहां इस सोच से समझा जा सकता है कि आखिर इस्लामिक भीड़ की मंशा क्या है।
2015 में तुर्की में समुद्र के किनारे सीरिया के तीन वर्षीय मासूम बालक आयलन कुर्दी का शव औंधे मुंह पड़ा मिला था। इस बच्चे की तस्वीर देखकर दुनिया भर में मानवता की हूक उठी थी। इसी तस्वीर के बाद सीरिया का संकट वैश्विक फलक पर उभरा और यूरोपीय देश इंसानियत के नाते मदद के लिए आगे आए। जर्मनी के आम नागरिकों ने तो सरकारी मदद के लिए अपने घरों तक के दरवाजे खोल दिए थे। परिणाम अकेले जर्मन में 10 लाख से भी अधिक शरणार्थियों को शरण मिल गई थी। फिर मदद के लिए फ्रांस, ब्रिटेन और आस्ट्रिया आगे आए, किंतु अब फ्रांस और जर्मनी में यही शरणार्थी इस्लामिक आतंकवाद का हिस्सा बनकर इन देशों के लिए संकट बन रहे हैं।
भारत में भी कमोबेश स्थिति अच्छी नहीं है। मूल निवासियों पर जीवन का संकट सिर्फ फ्रांस या यूरोप के देशों में ही नहीं है। यहां बंगाल में हुए सुनियोजित दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर, मंदिर और दुकानें लूटे जाने का सिलसिला सिस्टम का एक सामान्य हिस्सा बन चुका है। इसी प्रकार से देश में अन्य राज्यों में घट रहीं अनेक घटनाएं हैं जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि हिन्दुओं को भय और आतंक के साए से जीना पड़ रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि सबसे ज्यादा जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक समेत कुल यह 17 राज्यों में हिंदुओं को अपनी जन्मभूमि वाले स्थानों को छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है या निरंतर इस तरह के प्रयास जारी हैं ।
1947 के बाद विभाजित भारत में दंगों का इतिहास हो या तमाम साम्प्रदायिक घटनाएं। 80 प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या होने के बाद भी किसका कितना भागीदारी का प्रतिशत है, आप स्वयं आंकड़े उठाकर देख सकते हैं। क्या माना जाए ? यह सिर्फ संयोग है? या इस तरह की देश भर में घट रही सभी घटनाएं किसी खास योजना से की जा रही हैं, जिसमें सिर्फ और सिर्फ हिन्दू समाज को ही लक्षित किया जा रहा है। यह किस हद तक है। वह आप स्वयं देखें। ‘सिर कलम’ करने से लेकर ‘लव जिहाद’, ‘मतान्तर’, धोखा और रेप जैसे अपराधों में जनसंख्यात्मक रूप से मुसलमानों की संख्या ही अधिक है । भारत में करोड़ों की संख्या में रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठिओं से लेकर रोहिंग्याओं की अपराध में संलिप्तता अनेकों बार सामने आ चुकी है। हम यदि अब भी नहीं हुए सावधान तो यह फ्रांस का खतरा भारत से बहुत दूर नहीं है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)