गर्भवतियों के लिए वरदान बन रहा मुरादाबाद का जिला अस्पताल

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मुुरादाबाद, 19 मई (हि.स.)। मुरादाबाद का जिला अस्पताल गर्भवती महिलाओं के लिए वरदान बन रहा है। एक निजी अस्पताल में भर्ती गर्भवती महिला की हालत अधिक बिगड़ने पर उसे जिला अस्पताल के लिए रेफर किया गया। जहां पर चिकित्सकों ने बेहतर इलाज देकर महिला की जान बचा ली।

कटघर की रहने वाली सायरा की बच्चेदानी फट गई। इससे गर्भ में ही उसके बच्चे की मौत हो गई। मामला गंभीर होता देख प्राइवेट अस्पताल ने केस को जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। जिला अस्पताल की टीम ने मात्र 15 मिनट में ऑपरेशन कर सायरा की जान बचाकर एक मिसाल पेश की। सायरा कहती हैं कि बड़ी गलती की जो मैं निजी अस्पताल गई। वहां रहती तो बच्चे के साथ मेरी भी मौत हो जाती। अब मैं प्रसव के लिए किसी को भी निजी अस्पताल में जाने के लिए नहीं कहूंगी।

सायरा का मामला बानगी भर है। हकीकत में जिला अस्पताल में हर दिन प्रसव के कई ऐसे अति गंभीर मामले आते हैं जिनका तत्परता से प्रबंधन होता है। अधिकांश मामले लपरवाही के चलते सामान्य होने के बावजूद अति गंभीर प्रसव की श्रेणी में चले जाते हैं।

जिला महिला चिकित्सालय की नर्स मेंटर नैंसी सिंह बताती हैं कि बच्चे के जन्म के बाद हमारे पास उसके जान बचाने के लिए मात्र 60 सेकेंड होते हैं। मिनी स्किल लैब से यहां की नर्सें प्रशिक्षित हैं और खुद बच्चे की जान बचाने में सक्षम हो गई हैं। उन्होंने बताया कि इंडियन हेल्थ एक्शन ट्रस्ट के दिशा-निर्देश के अनुसार दिसंबर 2021 से अस्पताल में नई व्यवस्था शुरू की गई है। अब महिला अस्पताल में ओपीडी में आने वाली गर्भवतियों की स्क्रीनिंग करके शुरू में ही उन्हें हैंड बैंड पहना दिए जाते हैं। ग्रीन बैंड उनको जिनको तत्काल देखने की जरूरत नहीं है। येलो बैंड यानि गर्भवती को तत्काल देखने की जरूरत है, जबकि रेड बैंड आकस्मिक आवश्यकता का सूचक है। यहां की टीम बैंड देखकर तुरंत उपचार शुरू कर देती है।

अब कम रेफर होते हैं केस : सीएमएस

मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सुनीता पाण्डेय ने बताया कि नई व्यवस्था के शुरू होने से पिछले छह माह में बड़ा बदलाव आया है। अस्पताल में पहले जहां 60 प्रतिशत महिलाएं हायर सेंटर रेफर की जाती थीं, वहीं अब मात्र 20 प्रतिशत महिलाओं को रेफर करने की जरूरत पड़ रही है। अस्पताल में ही उच्च जोखिम वाली गर्भवतियों का इलाज हो जा रहा है। पीपीएच व एक्लेम्पसिया ग्रस्त गर्भवतियों के लिए अलग से किट भी बनाई गई है। जो डिलीवरी के समय साथ रखी जाती है। ऐसे में इलाज के दौरान दवाई के लिए इधर-उधर भागने में समय बर्बाद नहीं होता, तुरंत उपचार से गर्भवती और बच्चे की जान बच जाती है। जिला अस्पताल में नवजात शिशु मृत्यु अब न के बराबर है। अस्पताल में नर्स व स्टाफ की मेहनत का ही नतीजा है कि 2021 में कायाकल्प में जिला महिला चिकित्सालय 41वीं रैंक पर था, जो कि इस साल 16वीं रैंक पर आ गया है। इसके अलावा बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट में 90 फीसदी से अधिक अंक मिले हैं।