रतलाम: फाग लोकोत्सव कार्यक्रम में बिखरे फाग के विविध रंग

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रतलाम, 16 मार्च (हि.स.)। मालवांचल लोक कला एवं संस्कृति संस्थान में फाग लोकोत्सव कार्यक्रम में फाग के विविध रंग बिखेरे गए । ब्रज, बुंदेलखंड निमाड़ एवं मालवा के फाग गीतों की सस्वर प्रस्तुतियां दी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही शिवकांता भदौरिया ने ‘माधव प्रीत न होत पुरानी’ पद गाते हुए कहा कि फाग के रंग अनेक हैं । पर्वों के अपने ही रंग होते हैं जो हमे जीवन एवम जमीन से जोड़ते हैं । कृष्ण तो पूरे रंग रसिया हैं । होली और कृष्ण एक दूसरे के पर्याय हैं । कृष्ण का मनोविज्ञान बहुत बड़ा है उन्होंने समाज को सखाभाव नेतृत्व की क्षमता एवम लोकनायकत्व प्रदान किया है ।

मुख्य आतिथ्य प्रदान कर रही डॉ मंगलेश्वरी जोशी ने रंगों की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘रंग ऐसा भरो न रंग नफरत का हो न रंग मजहब का हो’ ! डॉ जोशी ने निमाड़ की लोक प्रचलित फागें ‘जमुना किनारे मोरा बाग मलनिया राधे , श्याम की मथुरा ! राधे के हाथ मे रंग पिचकारी मोहन के हाथ गुलाल का गायन किया ।

विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्णिमा श्रीवास्तव ने कहा कि यहाँ का सौहार्दपूर्ण वातावरण है । ऐसा अपनत्व की सारी नकारात्मता इस ओजस्वी आनन्दमय वातावरण में विलीन हो गई है । राग द्वेष को छोड़कर जो सकारात्मक भाव विचारों का रंग होता है जिसमें हम सभी रँगे हुए हैं । जीवन में सकारात्मक रंग होना चाहिए। रश्मि उपाध्याय ने होली विविध चित्र खींचते हुए कहा कि फाग का कोई नकारात्मक अर्थ नहीं होता है । फाग हमें आनन्द उल्लास उमंग से सराबोर कर जीवन की ओर ले जाता है कहते हुए धरती के गीत गा रे ! मानव के गीत गा रे ! गीत गुनगुनाया ।

वनिता भट्ट ने सुप्रसिद्ध बुंदेली ईसुरी की फागें ‘बखरी रैय्यत है भाड़े की’ ,ब्रज गलियन में गिरधारी , खेले फाग राधिका प्यारी ! आदि का सस्वर पाठ किया । ममता अग्रवाल ने अपनी फाग विषयक रंगारंग अभिव्यक्ति में रंगों का जीवन पर प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘हमेशा ब्राइट रहिये और राईट रहिये ‘ । डॉ उषा व्यास ने फाग एवम कृष्ण के जीवन को चित्रित करते हुए कहा कि कृष्ण ने जीवन मे विविध रंगों को स्थापित किया है । आनन्द उमंग हास-परिहास सभी हमे कृष्ण से ही मीले है । जीवन की उत्तरावस्था में आप सभी लोगो के साथ बैठना हमारी लोक संस्कृति पर बात करना जैसे हमे चिर युवा बना देता है । मैं इस पुनीत कार्य के लिए बेटियों को बधाई देती हूं कि वे सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर बात करती है ।

सांत्वना शुक्ला ने ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे सुनादे जरा बांसुरी ! गीत गाया । मोनाली पींगे ने ‘है अनोखी रुत धूम मचाओ ऐसी होली मनाओ’ गीत गाया । अनुराधा खरे ने अपने पिता कन्हैयालाल खरे(दिल्ली) की पुण्य स्मृति में उनकी रचना ‘टेसू के फूल खिले मनमोहन ;रूपसी लगे श्रंगार किये है’ सुनाई। सीमा राठौर ने भवानी प्रसाद मिश्र की रचना ‘चलो फागुन की खुशियां मनाएं’ गीत गाया। छाया शर्मा ने कहा कि सभी रंगों के साथ जीवन भक्ति का रंग भी होना चाहिए ‘श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया’ भजन प्रस्तुत किया । सरिता दशोत्तर ने अपने विचार रखते हुए अपनों के संग अपनत्व का रंग की बात कही । इस फाग उत्सव में स्नेह -प्रेम के रंग ने मुझे सराबोर कर दिया । आज हम सभी अपने आप को जी गए कहते हुए शुभकामनाएं प्रकट की ।

डॉ शोभना तिवारी ने ब्रज की होली पर प्रकाश डालते हुए पद्माकर की फागों ‘फाग की भीर अभिरन में गहि गोविंद भीतर के गई गौरी, ऐरी इन नैनन के नीर में अबीर धोरी’ आदि का सस्वर पाठ कर फाग गीत पड़ा। संचालन डॉ शोभना तिवारी ने किया । आभार रश्मि उपाध्याय ने माना । सभी ने रंग गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं प्रेषित की ।