कम्पनी का निदेशक होने से चेक बाउन्स केस में उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता : हाईकोर्ट

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प्रयागराज, 10 मार्च (हि.स.)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि केवल एक कम्पनी के निदेशक होने के नाते चेक बाउंस होने के मामले में धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति सैयद आफताब हुसैन रिजवी ने गौतमबुद्ध नगर के जतिंदर पाल सिंह द्वारा धारा 482 सीआरपीसी के तहत दायर एक याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

विपक्षी ने एक शिकायत दर्ज की और आरोप लगाया गया कि वह विनिर्माण और सिग्नलिंग उपकरणों, औद्योगिक बैटरी और अन्य उपकरणों के व्यवसाय में लिप्त है। याची भी कम्पनी अधिनियम, 1956 के तहत निगमित एक पब्लिक लिमिटेड कम्पनी है और अन्य आरोपी कम्पनी के निदेशक/कार्यकारी निदेशक हैं।

याची ने सहायक उपकरण के साथ बैटरी बैंक, चार्जर के दो सेटों की आपूर्ति के लिए एक खरीद आदेश दिया। शिकायतकर्ता ने सामग्री की आपूर्ति की और बाद में शिकायतकर्ता के पक्ष में उनकी साइट पर आपूर्ति किए गए सामान के भुगतान के लिए आरोपी ने 1-1 करोड़ रुपये के दो चेक जारी किए। शिकायतकर्ता द्वारा भुगतान के लिए प्रस्तुत करने पर उसका चेक बाउंस कर दिया गया। दूसरा चेक भी अनादरित (बाउंस) हो गया।

विपक्षी शिकायतकर्ता ने उक्त दो चेकों के तहत बकाया राशि के भुगतान की मांग करते हुए कानूनी नोटिस जारी किया। जब कानूनी नोटिस प्राप्त होने के बावजूद वे अनादरित चेक की राशि का भुगतान निर्धारित समय के भीतर करने में विफल रहे, तो एक शिकायत दर्ज की गई। जिसमें मजिस्ट्रेट ने 7 जनवरी 2014 के आदेश द्वारा आवेदक और शिकायत में नामित अन्य आरोपियों को धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत अपराध के परीक्षण के लिए समन किया।

उक्त समन आदेश से व्यथित होकर आवेदक ने आपराधिक पुनरीक्षण दायर किया था। विशेष न्यायाधीश एससी-एसटी एक्ट द्वारा निर्णय और आदेश 2 जनवरी 2021 द्वारा खारिज कर दिया गया था।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी कम्पनी के निदेशक के दायित्व के लिए यह दिखाया जाना चाहिए कि निदेशक कम्पनी के व्यवसाय के संचालन के लिए जिम्मेदार था।

कोर्ट ने पाया कि शिकायत के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि इस बात का कोई विशेष प्रमाण नहीं है कि आवेदक कम्पनी के दिन-प्रतिदिन के मामलों में शामिल है। केवल सामान्य आरोप है कि आवेदक कम्पनी का निदेशक है। आवेदक द्वारा दाखिल किए गए दस्तावेज यह साबित करते हैं कि आवेदक एक नामित निदेशक था और जिसने अब इस्तीफा दे दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि आवेदक के बारे में विशिष्ट आरोपों के अभाव में उस पर धारा 138 एनआई एक्ट के तहत किसी भी अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। कोर्ट ने याची के खिलाफ पारित तलब करने के आदेश को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट मामले पर ठीक से विचार करने में विफल रहे हैं।