एंकर- नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ट्वीट किया कि भारत जीत गया है. उसके बाद से अपनी छवि को और बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री ने क्या किया, इसे बताने की जरूरत शायद ही हो। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हो, जहां पीएम मोदी की मौजूदगी नहीं है। ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, कू, उनकी खुद की वेबसाइट और उनका खुद का मोबाइल ऐप्लीकेशन. हर जगह प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी है, जहां उनकी छवि को गढ़ने की अनवरत कोशिश की जाती रही है। लेकिन अब स्थिति तेजी से बदली है केंद्र सरकार ने जब सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने की कवायद शुरू की तब निश्चित रूप से ट्विटर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करने का काम शुरू कर दिया।
साल 2020 के अंत में शुरू हुए किसान आंदोलन के दौरान इस छवि का टूटना शुरू हो गया और जैसे ही इस छवि का टूटना शुरू हुआ, सत्ताधीशों का सोशल मीडिया से पंगा भी शुरू हो गया. 26 जनवरी को लाल किले पर हुई हिंसा के बाद किसान आंदोलन के समर्थन में पॉप स्टार रेहाना ने ट्वीट किया. फिर स्वीडिश एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग ने ट्वीट किया और उसके बाद शुरू हो गया टूलकिट प्रकरण, जिसमें कहा गया कि भारत को बदनाम करने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश की जा रही है. भारत में दिशा रवि की गिरफ्तारी भी हुई थी। इस दौरान भारत सरकार की ओर से ट्विटर को कहा गया था कि वो कुछ अकाउंट्स को सस्पेंड कर दे क्योंकि भारत विरोधी गतिविधियां चल रही हैं. फौरी तौर पर ट्विटर ने अकाउंड विदहेल्ड भी किए लेकिन जांच के बाद उन्हें फिर से बहाल कर दिया गया. इससे भारत सरकार और ट्विटर के बीच एक तनाव की स्थिति पैदा हो गई. सरकार की ओर से कहा गया कि ट्विटर दोहरे मापदंड अपना रहा है तो ट्विटर की ओर से कहा गया कि वो लोगों की अभिव्यक्ति की आवाज बनता रहेगा. लेकिन फिर 25 फरवरी को सरकार की ओर से नए आईटी ऐक्ट को लागू कर दिया गया. सख्त प्रावधान किए गए और कोशिश की गई कि सोशल मीडिया के कॉन्टेंट पर भी मॉनिटरिंग सरकार की ही रहे.
अभी ये प्रकरण पूरी तरह से खत्म भी नहीं हुआ था कि कोरोना की दूसरी लहर आ गई. एक दिन में चार लाख नए मरीज सामने आने लगे, एक दिन में मौतों का आधिकारिक आंकड़ा चार हजार को भी पार करने लगा और इसने बनी बनाई छवि को एक बार फिर से ध्वस्त कर दिया. लार्जर दैन लाइफ वाली गढ़ी गई छवि की परत प्याज के छिलके की तरह एक-एक करके उतरने लगी. राष्ट्रीय स्तर पर भी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी. राष्ट्रीय स्तर पर खबरें छपने लगीं कि कोरोना से हो रही मौतों के लिए देश का सिस्टम जिम्मेदार है. लेकिन विदेशी मीडिया ने बिटविन द लाइन्स कुछ नहीं रखा. सीधे लिखा कि कोरोना के ऐसे दुष्प्रभाव के लिए प्रधानमंत्री मोदी और उनका दंभ जिम्मेदार है. अगल-अलग देश की अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में भाषाई अंतर हो सकता है, लेकिन उनके कहने का तरीका लगभग एक जैसा था.
विदेश मंत्रालय ने अपने एंबेसडर्स के जरिए ऐसी रिपोर्ट्स को रोकने की कोशिश भी की, लेकिन कई बार नाकामी ही हाथ लगी. वहीं विदेश में छपी तीखी और सख्त रिपोर्ट्स वाया सोशल मीडिया लगातार भारत के लाखों लोगों तक पहुंचती रहीं और अब भी पहुंच रही हैं. ये सब उसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हुआ, जहां करीब आठ साल से प्रधानमंत्री की छवि गढ़ी जा रही थी.
गौरतलब है कि कोरोना के दौरान ऑक्सीजन, बेड और वेंटिलेटर के लिए त्राहिमाम करती लोगों की तस्वीरों ने छवि को डेंट करना शुरू कर दिया. रही-सही कसर श्मसान में जलती चिताओं और कब्रिस्तान में खुदती कब्रों ने पूरी कर दी. जो कुछ और बचा था, उसे गंगा में उतराते और बालू के नीचे दबे शवों ने पूरा कर दिया, जिसे सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को दिखा दिया। इस बीच दो एजेंसियों ने अपने सर्वे में ये भी पाया कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ गिर रहा है. सर्वे करने वाली एक एजेंसी थी मॉर्निंग कंसल्ट, जो 13 देशों के राष्ट्राध्यक्षों की रेटिंग पर नजर रखने का दावा करती है. उसने कहा कि एक महीने के अंदर ही पीएम मोदी की अप्रूवल रेटिंग 73 से घटकर 63 फीसदी पर आ चुकी है. वहीं भारत में ऑरमेक्स मीडिया की ओर से दावा किया गया कि पीएम मोदी की अप्रूवल रेटिंग 50 फीसदी से भी कम हो गई है और अब वो महज 48 फीसदी है.